Saturday, October 14, 2017

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Friday, May 12, 2017

173. जालोर जिला और दोहरा मताधिकार..

जालोर जिला और दोहरा मताधिकार..
प्राचीन समय में जालोर में चंड प्रद्योत का राज्य था। ऐसा माना जाता है, जो भगवान बुद्ध और अजात शत्रु का समकालीन था। यहाँ पर उस समय कालमों का गण राज्य भी रहा। बाद में यह इलाका मौर्य और गुप्त राज्य के अधीन भी रहा। गुजरात्रा के अधीन, सिंध के अधीन...। राजपूतों के आविर्भाव होने पर यह राजपूतों के अधीन रहा। चौहान से पहले पंवार और बाद में राठौड़ । कुछ समय गेहलोतों के अधीन भी रहा।
आजादी से पहले यह जिला जोधपुर(मारवाड़ रियासत) का भाग था, जहां छोटी-छोटी जागीरे थी। जागीरदारी के विरोध में जयनारायण व्यास ने आंदोलन चलाया और 1940 में यहाँ पर भी मारवाड़ लोक परिषद का गठन किया। व्यास को जेल जाना पड़ा। बेगारी और जागीरदारी से पीड़ित जातियों ने, विशेषकर मेघों/मेघवालों, बाम्भी आदि जातियों से जितना समर्थन जयनारायण व्यास को जोधपुर के आसपास के गांवों में मिला, उनका इतना समर्थन जालोर में नहीं मिला, यह भी एक हकीकत है। रियासतें ख़त्म हो गयी। जागीरे ख़त्म हो गयी पर जालोर इलाक़ा राम राज्य की जद में ही रहा, इसलिये यहाँ की बेगार पीड़ित जातियां आज भी पिस रही है। इस पर फिर कभी...

लोकसभा के चुनाव 1952 से 1967
सन् 1952 से 1967 तक जालोर की लोकसभा सीट एकल मतदान की ही रही और सामान्य सीट रही अर्थात इस पर आरक्षण नहीं था। सन् 1952 में बाड़मेर-जालोर मिलाकर एक सीट बनायीं गयी। सन् 1957 में जालोर जिला ही अलग सीट रही, बाड़मेर का क्षेत्र अलग कर दिया। सन् 1962 में भी भी यही स्थिति रही। सन् 1967 में सिरोही और जालोर की निम्न तहसीलों को मिलाकर MP की एक सीट बनायीं गयी-- सिरोही, आबू, रेवदर, सांचोर, रानिवाङा, भीनमाल, आहोर और जालोर।

विधानसभा के चुनाव 1952
सन् 1952 में जालोर जिले में 5 विधानसभा के क्षेत्र थे। कोई दोहरे मतदान की सीट नहीं थी। सभी एकल मतदान की सामान्य सीटें थी, जो निम्न थी- जालोर-ए, जालोर-बी, जसवन्तपूरा, सांचोर और जसवंतपूरा-सांचोर। इन पर न तो दोहरा मताधिकार था और न आरक्षण। 
सन् 1957 में जालोर जिले में विधानसभा हेतु 5 की जगह निम्नलिखित 4 सीटें बनायीं गयी- सांचोर, जालोर, रानीवाड़ा और आहोर। इस में जालोर सीट दो सदस्यों वाली सीट यानि दोहरे मतदान की थी। एक सामान्य को चुनना और एक अनुसूचित जाति के प्रतिनिधि को चुनना। जालोर विधानसभाकी दोनों सीटें(सामान्य और आरक्षित) राम राज्य परिषद के प्रत्याशियों ने जीती।
सन् 1962 में दोहरी सीट या दोहरे मतदान की जगह सीटें रिजर्व की गयी और जालोर में पुन 4 की जगह 5 सीटें तय की गयी, जो सांचोर, रानीवाड़ा, भीनमाल, जालोर और आहोर थी। इस में जालोर रिजर्व पर कांग्रेस जीती।
सन् 1967 में यही 5 सीटें रही। जालोर sc सीट पर स्वतंत्र पार्टी का उम्मीदवार जीता और बाद में कांग्रेस में मिल गया। उसकी मृत्यु होने पर दिनाक 4/11/68 को उप चुनाव हुए, जिस में कांग्रेस का प्रत्याशी जीता।
कुल मिलाकर तथ्य यह है कि इस जिले में दोहरी सीट या दोहरा मताधिकार रहा है और राजस्थान बनने से लेकर कोई न कोई आरक्षित सीट रही है।
जिले में सन् 1961 में निम्नलिखित अनुसूचित जातियां निवास करती है जिनकी सन् 1961 जनगणना के अनुसार निम्न जनसंख्या रही है-
Reference:
Rajasthan District Gazetteers- Jalore


Tuesday, May 9, 2017

172. जैसलमेर जिला और दोहरा मतदान


जैसलमेर जिला और दोहरा मतदान--
जिले में 1952 से 1962 विधानसभा हेतु एक ही सीट रही। जनसंख्या घनत्व के लिहाज से जैसलमेर सबसे कम आबादी वाला जिला रहा है। सन् 1952 में पूरे जिले की जनसंख्या के साथ जोधपुर जिले के कुछ भाग को मिलाकर जैसलमेर की एक विधानसभा सीट निर्धारित की गयी। सन् 1952 से लेकर 1962 तक एक ही प्रतिनिधि चुना जाता रहा। यहाँ कभी भी दोहरा मताधिकार यानि कि एक सीट पर दो प्रतिनिधि नहीं चुने गए।
लोकसभा हेतु भी सन् 1952 में जोधपुर और जैसलमेर का पूरा जिला मिला कर एक संसदीय प्रतिनिधि एकल मताधिकार से चुना गया। सन् 1957 को जैसलमेर का पूरा जिला और बाड़मेर का पूरा जिला मिलाकार उस में जोधपुर की पूरी फलौदी और शेरगढ़ तहसील और ओसियां तहसील के कुछ भाग को मिलकर एक सीट बनायीं गयी और एकल मताधिकार से एक ही साँसद चुना गया। 1962 में इस में बाड़मेर जैसलमेर तथा जोधपुर के ये 8 विधानसभा क्षेत्र मिलाकर एक सीट बनायीं गयी- सिवाना, पचपदरा, बाड़मेर, गुड़ामालानी, चौहटन, जैसलमेर, शेरगढ़ और फलोदी। सन् 1967 में फलोदी इससे अलग कर दिया और विधानसभा हेतु बनाया गया नया क्षेत्र- शिव इसमें जोड़ दिया।
स्पष्ट यह है कि बाड़मेर जैसलमेर में न तो कोई आरक्षित सीट रही और न यहाँ कभी दोहरा मताधिकार रहा।
(सन् 1950 में अनुसूचित जाति में शुमार गरु/ गारो/ गरुड़ा जाति के सामाजिक कार्यकर्ता श्री आत्माराम गर्ग द्वारा कांग्रेस संवेदित 'हरिजन सुधार मंडल' की स्थापना की गयी । जिसका 1952 में इसका नाम 'हरिजन प्रजनित जाति संघ' रख लिया गया। सन् 1954 में पुनः इसी संस्था का नाम बदलकर 'आल राजस्थान दलित वर्ग संघ' हो गया। इसके बाद यह संस्था 'जिला दलित वर्ग संघ' से जानी गयी।)
जैसलमेर में अनुसूचित जातियों में शुमार निम्न जातीयां निवास करती है, सन् 1961 की जनगणना के अनुसार जिले में उनकी जनसंख्या निम्नानुसार थी...
Reference:
Rajasthan District Gazetteer- Jaisalmer.


Sunday, May 7, 2017

171. पाली जिला और दोहरा मताधिकार..

पाली जिला और दोहरा मताधिकार..
राजस्थान के गठन से पूर्व पाली जोधपुर रियासत का हिस्सा था । जोधपुर (मारवाड़) के राजस्थान में विलय होने पर पाली भी राजस्थान का एक जिला बन गया।
सन् 1952 का विधानसभा का आम-चुनाव.
सन् 1952 के आम चुनाव में पाली जिले में 7 विधानसभा सीटें थी। ये सातों ही एकल मताधिकार और एक-विधायक चुनने वाली सीटें ही थी। इन सीटों में न तो कोई आरक्षित सीट थी और न इन में से किसी को दोहरा मताधिकार प्राप्त था। सन् 1952 में विधानसभा हेतु- बाली, बाली-देसूरी, सोजत-देसूरी, पाली-सोजत, सोजत, जेतारण पूर्व- सोजत पूर्व और जेतारण उत्तर-दक्षिण नाम से सूचित थी। 1952 में सभी जगह निर्दलीय जीते।
सन् 1957 का विधानसभा का आम-चुनाव.
सन् 1957 को राजस्थान के पुनर्गठन होने पर पाली जिले को 5 विधानसभा क्षेत्रों में विभाजित किया गया- खारची, बाली, रायपुर, सोजत और पाली।
इस में खारची और बाली दोहरे मतदान की आरक्षित सीटें थी। खारची अनुसूचित जाति हेतु और बाली अनुसूचित जनजाति हेतु सुरक्षित रही।
सन् 1962 का विधानसभा का आम-चुनाव.
सन् 1962 में एक ही क्षेत्र से दो प्रत्याशी चुनने की प्रणाली खत्म कर दी गयी। पाली जिले में 5 की जगह 7 सीटें बनायीं गयी- पाली, खारची, देसूरी, बाली, सुमेरपुर, रायपुर और सोजत। जिस में देसूरी अनुसूचित जाति हेतु और सुमेरपुर अनुसूचित जनजाति हेतु आरक्षित की गयी।
लोकसभा हेतु 1952 में पाली जिले को 2 सीटों में बांटा.. 1 नागोर-पाली, 2.- सिरोही-पाली। 1957 में ये पाली-जोधपुर और जोधपुर तथा 1962 में भी इसी नाम से रही.
(पाली में 1883 को आर्य समाज की स्थापना हुई थी)
सन् 1961 में पाली में अनुसूचित जातियों की जातिवार जनसंख्या निम्नानुसार थी...

170. मेघ - आर्यों से पूर्व के आदिनिवासी

मेघ: आर्यों से पूर्व के आदि-निवासियों के वंशज है!
सन्दर्भ:
काश्मिर: देश और संस्कृति , पृष्ठ-96

Saturday, May 6, 2017

169. सिरोही और विधान सभा में दोहरे मतदान की सुरक्षित सीटें

सिरोही और विधान सभा में दोहरे मतदान की सुरक्षित सीटें --

सिरोही एक छोटी रियासत/राज्य था, जो अंग्रेजों के अधीन था। सन् 1948 से पहले सिरोही राजपुताना एजेंसी के अधीन इसका प्रशासनिक कार्य होता था। सन् 1948 को सिरोही को राजपुताना एजेंसी से निकालकर 'इंडिया स्टेट ऐजेंसी' के अधीन कर दिया गया था। 8 नवंबर 1948 को भारत सरकार और सिरोही के बीच इकरार (agreement) हुआ और सिरोही भारत-सरकार के अधीन आ गया। जिसे 5 जनवरी 1949 को बोम्बे सरकार के अधीन कर दिया गया अर्थात वह बॉम्बे राज्य का हिस्सा हो गया। 25 जनवरी 1950 को आबू और देलवाड़ा तहसील को छोड़कर बाक़ी हिस्सा राजस्थान में मिला दिया। परंतु जब राजस्थान का पुनर्गठन किया गया तो 1 नवंबर 1956 को आबू और देलवाड़ा भी राजस्थान में मिला दिए गए। वर्तमान में सिरोही राजस्थान प्रान्त का एक जिला है।
सन् 1952 के चुनाव में सिरोही में तीन विधानसभा क्षेत्र ( भवरी, शिवगंज और सिरोही) थे यानि कि यहाँ से 3 विधायक चुने जाते थे। सन् 1952 के आम चुनाव में सिरोही की कोई भी सीट आरक्षित नहीं थी अर्थात यहाँ पर 1952 में कोई भी दोहरे मताधिकार की सीट नहीं थी।
राजस्थान के पुनर्गठन के बाद दूसरे आम चुनाव सन् 1957 में हुए, जिस में सिरोही जिले में विधानसभा के दो क्षेत्र- सिरोही और आबू तय किये गए। सिरोही सीट को दोहरे मताधिकार के तहत आरक्षित किया गया। इस प्रकार सिरोही जिले से 1957 को 3 विधायक चुने गए- दो सामान्य और एक आरक्षित।
सिरोही की सामान्य सीट पर मोहबत सिंह जीते और दोहरे मतदान हेतु आरक्षित सीट पर निर्दलीय श्री विरका जीता। कांग्रेस की ओर से श्री तेजाराम बहुत कम वोटों से हार गए।
सन् 1962 में दोहरी सीट प्रणाली खत्म कर सीटें सुरक्षित की गयी। सिरोही जिले में 3 विधानसभा क्षेत्र तय किये- सिरोही, पिंडवाड़ा और आबू। इस में सिरोही सीट आरक्षित रही। 1962 में सिरोही आरक्षित सीट पर कांग्रेस के धर्माराम विजयी हुए।
निष्कर्ष यह है कि सिरोही जिले में भी दोहरे मतदान की सीट रही है।
लोकसभा के लिए सिरोही को पाली में मिलाकर एक सीट रही। बाद में इसे पाली से निकाल कर जालोर सीट के साथ मिला दिया।
Reference:
Rajasthan District Gazetteer- Sirohi.

Thursday, May 4, 2017

168. सियालकोट के मेघ और आर्य समाज- 2

1910 में सियलकोट में एक और (अन्य) 'आर्य मेघ उद्धार सभा' का गठन--

 सियालकोट के आर्य-भगत पूर्ण का पुत्र रामचंद्र मेघ जाति का प्रथम स्नातक हुआ!

आर्य समाज ने "मेघ और उनकी शुद्धि " नामक पुस्तक प्रकाशित की,
जिस में मेघों को ब्राह्मण घोषित किया।...

(For detail read  history of Arya Samaj, these pages are from a short naration of its Sialkot  branch)

सन्दर्भ:
आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का सचित्र इतिहास,
द्वारा: भीमसेन विद्यालंकार
प्रकाशक : आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, लाहौर.
प्रकाशन वर्ष: विक्रमी संवत्  चैत्र 1992 तदनुसार ईस्वी सन् 1936


167. सियालकोट के मेघ और आर्यसमाज-1

1904 में सियालकोट मेघ सुधार सभा दवारा पहला विद्यालय खोला गया! इस स्कूल से कई मेंघ बालको ने उच्च शिक्षा प्राप्त की !

सन्दर्भ:
आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब का सचित्र इतिहास,
द्वारा: भीमसेन विद्यालंकार
प्रकाशक : आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, लाहौर.
प्रकाशन वर्ष: विक्रमी संवत्  चैत्र 1992 तदनुसार ईस्वी सन् 1936

Friday, April 21, 2017

166. काछबाराम

जोधपुर रेलवे स्टेशन के सामने कलिंगा के पास कोर्नर पर शान्ति भवन लॉज वाली लाल हवेली भी काछबाराम की ही थी ! जिसे भी खुर्द-बुर्द कर दिया गया।
[4/21, 1:00 PM] Tararam Jodhpur: बाड़मेर की सबसे बड़ी बिल्ड हुआ करती थी कभी!
[4/21, 1:02 PM] Tararam Jodhpur: After his death many people taken possession of its various parts and altered too .
[4/21, 4:01 PM] Tararam Jodhpur: हमारे इधर होली पर नवजात बच्चे की ढूंढ़ पर यह गाया जाता है। बच्चे को माँ हाथ में लेकर आँगन में खड़ी रहती है। ढूंढ़ ने वाले उसके ऊपर डंडे बजाते हुए यह दोहराते है।  फिर उनको नारियल और बख़्शीश देकर विदा करते है। यह होली मंगलाने के बाद उसी रात को किया जाता है....
*हरि हरि रे हरिया वेल,*
      *डावे कवले चम्पा वेल।*
कोकड़ माय जाड़ बूट,
       इण घर इतरा घोड़ा ऊंट।।

*इण घर इतरी गायों भैयों,*
       *इण घर इतरी टिंगडियों।*
इण घर जाया लाडल पुत,
       छोटी कुलड़ी चमक चणा।।

*डावे हाथ लपुकों ले,*
       *जीमणे हाथ चंवर ढोलाव।*
ज्यों ज्यों चम्पो लेहरों ले,
        डावे हाथ लेहरियों ले।।

*सात हवाणी जणा पच्चास,*
      *गेरीयो रो पूरो हास।*
घर धणयोंणी बारे आव,
        गुडरी भेली लेती आव।।

*साकलियों रो डालो लाव,*
         *गेरीयों री आस पुराव।*
गेरिया आया थारे द्वार,
          हरि हरि रे हरिया ढूंड।।

*हो........* हो........

  🌷
🌹🌹🌹🌹
[4/21, 4:05 PM] Tararam Jodhpur: हरिया: हरा
वेळ: बेल
डावे: बांया
कोंकड़: सीमा
माय: अंदर
झाड़ बूट: झाड़ झंखार
इतरा: इतना
इण: यह
इतरी: इतनी
......
....

Friday, February 17, 2017

165. Census 1961









164. As per Census-1961 - Sceduled Castes and Scheduled Tribes in the Ajmer District

As per Census-1961, following castes were enlisted as Sceduled Castes and Scheduled Tribes in the Ajmer District. For ready reference see the Rajasthan District Gazetteer Ajmer-1966 (Page 108 & 651)

Thursday, February 16, 2017

163. RAJASTHAN DISTRICT GAZETTEER- NAGAUR,

GAZETTEERS OF INDIA
RAJASTHAN DISTRICT GAZETTEER- NAGAUR,
GOVT OF RAJASTHAN, 1975, PAGE 75

Wednesday, February 15, 2017

162. In the area of Sirohi/Abu, Meghs were called Bhambis and Dhers.

Know your history from Gazetteers

In the area of Sirohi/Abu, Meghs were called Bhambis and Dhers.( see the GAZETTEER OF SIROHI AND MOUNT )

It has a running comment on it  in the Rajputana gazetteer volume-3, under the heading of 'village revenue officials.' It says as under:

"The principal village officials are the thanadar, the bhalownia and the banbi. The thanadars have charge of the police arrangements of the village. They are all Rajputs. In a few of the largest villages, such as Rohira, Pindwara, &c., there is a kind of naib thanadar called kanwaria. The bhalownias are all of the banya class, and are in Raj employ. Their duties correspond to those of patwaris in other districts. The banbis are Chamars or Dhers : they act as a sort of assistants to the thanadars, see to getting guides, coolies, supplies, &c., to travellers; run on messages, &c. Thanadars are paid wages at from five to fifteen rupees a month. The bhalownias are not paid regular wages in cash, but receive food and cleaning; and they and the thanadars both get shares of the produce in grain, varying according to circumstances. Banbis are generally paid a small sum annually in cash, and get shares of grain. The principal village servants are the carpenter, blacksmith, potter, currier and barber. Their remuneration also consists of a share of the grain from each house of the cultivating class, varying according to circumstances, which is given previous to the division of the produce." Page 120-121

Reference:
THE RAJPUTANA GAZETTEER.
VOLUME III.
SIMLA: GOVERNMENT CENTRAL BRANCH PRESS. 1880.

Monday, February 13, 2017

161. Meghwal in the census of Jaipur state-1911

know your history from the census reports.

MEGHWALs in the Census of Jaipur state-1911 are disdussed under the heading of 'Balais' on various pages of the census report..

 At page no. 237, appendix no.1 is given wherein brief notes on certain castes and sub-castes are given. After Description of Aggarwals and Ahirs, at page no.238 a brief note has been given on Balais, which says as under:

                    '' Balais "
''sub-castes:-
     1. MEGHWAL.
     2. KHANGAR.

'Both are separate endogamaous groups.'

'The Meghwals are more numerous than the other group.'
'They admit people of higher castes into their caste.'
'They have separate Panchayats.'

   After that a note is also given on 'CHAMARS' as under :

         'CHAMARRS'
'Sub-castes-
1. Raigars.
2. Chamars.'
 it is stated that 'They are separate endogamous groups. Formarly Chamars alone used to skin the dead carcasses of animals, but now the Raigars also do so.'
'Chamar marry the wife of the elder brother, but the Raigars abstain from doing so.'
'They have separate Panchayats'

reference
CENSUS OF JAIPUR STATE-1911, Page- 237



.

160. Social Status of Meghs in J&K

Know your history: Social status of Meghs in the state of Kashmir and Jammu in the past centuries
It remain as similar as prevailed in Marwar during that period. For Marwar, see Marwar Mardumshumari, 1891.

Here I am quoting word to word as written in Census of Kashmir in the year of  1901


      "19. None of the low castes, such as Meghs, Dooms, Chamars, etc., is allowed to enter the court-yard of a Hindu temple, nor any Hindu would liketo come in contact with them.

20. All the members of the castes named in the foregoing paragraph liveoutside the village, have their own wells and tanks to take water from, and haveto give warning of their approach to or keep out of the way of the high classHindus.

21. Amongst all the low castes, Meghs stand first; they do not touchDooms, Chamars, sweepers and Sansis. If they accidentally happen to do so,they wash themselves. Their caste principles are nearly the same as those ofother Hindus. They receive cash or dry substances from the above mentionedlow castes for performing their religious ceremonies ; and draw water with theirown vessels. But instead of the Brahmans the Meghs perform the dutiesconnected with the religious ceremonies of the low castes, while Gurus attendto all such rites amongst (he Bhikis or beggar class.)"  Page --78

Reference:
Census of India, vol-23,
census of Kashmir, 1901 report-1, page-78
The civil and military Gazette press, Lahore, 1902

In regard to land ownerships,
status of caste is shown as in descending order..at page 80

"Status in relation to the land.
(a) With regard to ownership—

1. Brahman. 5. Charak. 9. Langeh,
2. Thakkar. 6. Bahoo. 10. Baghal.
3. Manhas. 7. Jat. 11. Rakwal.
4. Rajputs. 8. Salehria. 12. Other castes.

(b) With regard to cultivation—
1. Brahman. 8. Charak. 15. Carpenters.
2. Jat. 9. Bahoo. 16. Meghs.
3. Kamboh. 10. Salebria. 17. Dooms.
4. Sanis. 11. Langeh. 18. Chamars.
5. Thakkar. 12. Baghal. 19. Bawarias.
6. Labana, 13. Rakwal. 20. Other castes."
7.Manhas  14. Blacksmith     Page- 80