Monday, November 21, 2016

157. अपने इतिहास को जानों

                                                         अपने इतिहास को जानों

                                                                                                                       लेखक : ताराराम

मेघवाल समाज सेवा समिति (रोई परगना 32 गांव), 
सिरोही में
दिनांक 06 नवम्बर, 2016 के अधिवेशन में दिया गया उद्बोध
                                                                
                                                 

भाईयों और बहिनों!  …
                आप सब के बीच में इस विशाल मेघ समुदाय के सम्मलेन में आकर मुझे अपार हर्ष और गौरव का अनुभव हो रहा है! इस विशाल आयोजन में आपने मुझे मेघ समुदाय पर बोलने का सु-अवसर प्रदान किया,  इसके लिए मैं इस संस्था का,  इस संस्था के सभी पदाधिकारियों और आप सबका आभारी हूँ. आपने जो यह संगठन खड़ा किया है, वह अपने आप में एक मिसाल है और यह आयोजन एक ऐतिहासिक समामेलन है. इस बात के लिए आप सभी बधाई के पात्र है. इस जमात में बच्चे,  युवा,  बुड्ढ़े,  माताएं,  बहिनें और बालिकाएं आदि सभी का अनुपम संगम है. इसके लिए सभी आयोजनकर्ताओं और सम्मलेन में सरीक होने वाले सभी लोगों का मैं तहे-दिल से अभिनन्दन करता हूँ और आभार व्यक्त करता हूँ.यह आपकी संगठन-शक्ति, नेतृत्व-परिपक्वता और निःस्वार्थ सेवा भावना की अभियक्ति है. कोई भी संगठन रातों-रात खड़ा नहीं होता है,  उसके पीछे कई लोगों की दिन-रात की मेहनत,  त्याग और तपस्या जुडी होती है. जिससे ही कोई संगठन जीवंत बना रहता है. इस समामेलन में वह जीवन्तता स्पष्ट रूप से झलक रही है, आप इस सबके लिए भी धन्यवाद के अधिकारी है.
          यह जो हमारा समाज है, सारे भारत में और भारत के बाहर भी फैला हुआ है, परन्तु राजस्थान में यह सर्वाधिक है.  संगठन की शक्ति के अभाव में इस जाति ने या यों कहे कि इस समाज ने  कई विपदाओं को भोगा है और भोगना पडा है या भोग रहा है, तो कोई गलत बात नहीं होगी. संगठन से ही कोई समाज आगे बढ़ता है और अपनी एक पहचान बनाता है,  इस में खलल आने से,  कतिपय कमियों के कारण इस समाज की जो ऐतिहासिक पहचान रही है,  उसे वह भूल चुका है. ऐसे संगठन उन-उन विपत्तियों के कारगर उपाय भी है. ऐसे अवसरों पर हमें उस पर चर्चा करनी चाहिए और हमारे समाज के बारे में हमारी जो समझ है, उसे आने वाली पीढ़ी को सौंपना चाहिए. किसी भी जीवंत समाज के लिए यह आवश्यक है. जो समाज ऐसा नहीं कर पाता है,  वह धीरे-धीरे काल के गहरे खड्डे में गिर जाता है और उसकी बुरी गति होती है. अपने गुणों का, अपनी धरोहर का संग्रहण करना और उसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरण करने का गुण केवल मनुष्य जाति के पास है. पढने-लिखने की कला ने उस गुण में चार चाँद लगा दिए, जिस के पास यह कला होती है, वह समाज उसे लिखकर सुगम रूप से अपनी आगे आने वाली पीढ़ी को सौंपने में कामयाब होता है. वह अपने इतिहास को, अपने ज्ञान को, अपने रीति-रिवाजों को, अपनी संस्कृति आदि को ऐसे माध्यमों से भविष्य के लिए सुरक्षित करता है. आज हमारा जो समाज है, उसके पास ऐसी धरोहर का नितांत अभाव है, परन्तु बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के पुण्य-प्रताप से हमारे पास पढ़ने-लिखने की कला आई है और वह गुण भी है. इसलिए जो भूले-बिसरे तार है, जो कुछ इधर-उधर बिखरी सामग्री है, उसे समेकित कर हम अपने इतिहास का संधान कर सकते है. अपनी संस्कृति की पहचान कर सकते है और उस इतिहास पर गौरव अनुभव कर सकते है. 
         इस अवसर पर मैं आपसे इस सम्बन्ध में चर्चा करूँ, उससे पहले यह बता देना चाहता हूँ कि भारत की सभ्यता और संस्कृति बहुत पुरानी है और यह विविधरूपा है, जिस प्रकार से दुनिया की अन्य संस्कृतियाँ किसी ना किसी एक धारा के रूप में जानी जाती है, वैसा निष्कर्ष-रूप से भारतीय सभ्यता या संस्कृति के बारे में गवेषित नहीं किया जा सकता है. जिन लोगों ने भारत की प्राचीन सभ्यता के बारे में खोज की है, अन्वेषण किया है, उन लोगों ने भारतीय सभ्यता के बारे में यह गवेषित किया है कि प्राचीन भारत में मोटे रूप से दो धाराएँ रही है. उसी से हमारी संस्कृति का विकास हुआ है. ये दो धाराएँ श्रमण और ब्राह्मण धारा के रूप में पहचानी गयी है. हिन्दू-शास्त्रों के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ वेद है और वेदों में इसके पुख्ता प्रमाण है. कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश में शुरू से ही दो धाराएँ रही है. इन दोनों धाराओं में आपसी आदान-प्रदान, विरोध और प्रतिरोध शुरू से ही रहा है फिर भी उनके आपसी सह-अस्तित्त्व के गुण ने उन्हें एकाकार बनाये रखा. यह हमारे देश की सबसे बड़ी खूबी है, जिस के कारण अनंत युगों से हमारी संस्कृति अक्षुण्ण रूप से आज भी निरंतर प्रवाहवान है.
हमें अपने इतिहास और संस्कृति को समझने के लिए इन धाराओं की और इन से निकली सभी छोटी-बड़ी धाराओं की जानकारी होना आवश्यक है, तभी हम अपने को पूरे रूप से पहचान पाएंगे या समझ पाएंगे. जो श्रमण धारा थी और जो ब्राह्मण धारा थी, उनमें उनकी मान्यताओं का, स्थापनाओं का, मूल्यों का, रीति-रिवाजों का और दुनिया को देखने-समझने का तात्विक, तार्किक और व्यवहारिक फर्क था. उनका तात्विक या तार्किक फर्क मनुष्य की गरिमा, उसके सम्मान और उस से जुडी मान्यताओं की स्थापनाओं को लेकर था और वह मुखर रूप में था. उसी से एक समाज व्यवस्था उभरी, एक समाज का निर्माण हुआ, जिस की विरासत हम सभी लोगों के पास है. आज का जो हिन्दू धर्म है या हिन्दू समाज है, उसमें कईं धाराओं का, धारणाओं का, संस्कृतियों का मिलन हुआ है फिर भी आधार रूप से हिन्दू धर्म की स्थापनाओं में वेद आधारित मान्यताओं को आगे किया जाता है और उसी आधार पर उसकी व्याख्या की जाती है. इस दृष्टि से हिन्दू धर्म और वेद-धर्म एक ही बन जाते है या मान लिए जाते है. ऐतिहासिक रूप से वेद धर्म की मान्यता है कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते है. वेद-धर्म की मान्यता अनुसार सृष्टि की उत्पति से ही यह भेद रहा है, जिसे ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त और अन्य सूक्तों में स्पष्ट किया है. समझने वाली बात यह है कि वेद-धर्म गैर-बराबरी और भेद-भाव वाले समाज की रचना की आधार भूमि प्रस्तुत करता है और इसी आधार पर वैदिक समाज का निर्माण हुआ. इस समाज रचना में मानवीय गरिमा में ब्राह्मण को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, उस से ऊपर कोई जा नहीं सकता है और नीचे के स्तर का कोई पैमाना नहीं है. वेदों की इन मान्यताओं के आधार पर ब्राह्मण ग्रंथों की रचनाएँ हुई. उपनिषद और पुराण लिखे गए. स्मृतियाँ  और अन्य भाष्य आदि लिखे गए. दूसरी ओर श्रमण धारा से बौद्ध और जैन धर्मों का प्रादुर्भाव और विकास हुआ. उनके आगम और पिटक ग्रंथों की रचना हुई. श्रमण धारा की स्थापना में मनुष्य और मनुष्य के भेद को नकारा गया. अगर इन दोनों धाराओं को देखा जाय तो प्राचीन भारत में श्रमण धारा मजबूती के साथ जन-मत को जकड़े हुए थी. भेद-भाव और गैर-बराबरी स्थापित करने वाले शास्त्रों और प्रमाणों का खंडन हमें इन ग्रंथों में मिलता है. यह धाराओं और धर्मों की स्थिति रही है.
अब अगर समाज व्यवस्था की ओर नजर डालें तो हमें उन-उन स्थापनाओं के आधार पर उन-उन समाजों का प्रादुर्भाव और विकास दृष्टिगोचर होता है. वेदों में वर्णित ऋषि और मुनि, जिन्हें हम आज के महात्माओं के समतुल्य मान सकते है,  वे अपनी-अपनी स्थापनाओं के आधार पर समाज-निर्माण हेतु संकल्पित और सजग नजर आते है और जो श्रमण परम्परा के ऋषि और मुनि थे, वे अपनी स्थापनाओं के आधार पर समाज की के निर्माण पर जोर देते हुए नजर आते है. इसके साथ ही इस साहित्य में राजनैतिक व्यवस्था के दर्शन भी होते है और विभिन्न वर्गों या लोगों में सत्ता एवं प्रतिष्ठा के लिए बहुधा संघर्ष होना पाया जाता है. प्राचीन वेद साहित्य और उपनिषद साहित्य के साथ ही श्रमण धारा के साहित्य में भी इनका एक क्रमिक विकास नजर आता है.
             वैदिक लोगों का बहुधा जिनसे संघर्ष होता रहा है, वे यहाँ के मूल वाशिंदे और वेदों की मान्यताओं से इत्तर मान्यताओं वाले समाज के रूप में उल्लेखित किये गए है. मैं इस अवसर पर उन सब पर नहीं जाना चाहता हूँ, बल्कि यह बात और तथ्य आपके सामने रखना चाहता हूँ कि हमारा जो समाज है, जिसे आज-कल मेग, मेघ, मेघवाल, मेगवाल या मेंगवार आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है या पुकारा जाता है, इस मेघ समाज की जड़े उसी गैर-वैदिक धारा या परंपरा से निकली है. ये लोग, जिसे आजकल मेघ या मेघवाल जाति के नाम से जाना जाता है, इस देश में शुरू से रहने वाले लोग है और इस देश की पुरातन परंपरा श्रमण परंपरा को मानने वाले लोग रहे है. वैदिक आर्य लोग बाद में भारत में प्रवेश करते है और यहाँ के वाशिंदों को छल-कपट, युद्ध और नीति-कुनीति से परावलम्बी बना देते है. इस बात के प्रमाण न केवल वेदों में है, बल्कि विश्व इतिहास की कई पुस्तकों में है. इस बात को हमारी नई पीढ़ी को समझना चाहिए. आपका जो इतिहास है, उसको या तो मिटा दिया गया या उसे खुर्द-बुर्द कर दिया या उस पर बाद में राज करने वाले लोगों ने हड़प लिया और उसे अपना बना लिया. आपको उस से इसी तरह वंचित कर दिया, जिस तरह से आपको सामान्य नागरिक अधिकारों से वन्चित कर दिया गया था, अतः जब आपको पढने-लिखने से दूर रखा गया तो आप अपने इतिहास से भी दूर हो गए और जो कुछ इन चालाक लोगों ने आपको बताया, उस पर आप विश्वास करते आये. परन्तु अब संविधान के बल से आपको पढ़ने –लिखने का अधिकार है, आप दुनिया का इतिहास पढ़ सकते हो, उसे जान सकते हो और समझ सकते हो. उस में से झूठ और सच की पहचान कर सकते हो और अपने इतिहास और गौरव को प्राप्त कर सकते हो. जो सुनी-सुनाई बातें है, वे सभी इतिहास नहीं होती है. उस में से तथ्य और सत्य को छांटना, आज के युग में झूठ और निर्मूल को सत्य से अलग करना और पहचानना कोई मुश्किल नहीं है.
                                इस अवसर पर मैं सिर्फ आपके सिरोही के इतिहास पर ही बात करना चाहूँगा और बताना चाहूँगा कि आप इन घटनाओं और सन्दर्भों को समझे. किस प्रकार से उन लोगों ने आपके इतिहास और आपकी धन-धरती पर कब्ज़ा कर आपके मालिक बन गए और आपको हैठियल बना दिया था. अब एक नागरिक होने के नाते आजादी से पहले राज करने वाले और और उनकी पराधीन जनता के अधिकारों में कोई भेद नहीं रहा है, इतिहास में जो भेद डाला गया है, उसे आपको तोड़ना है, उन मिथकों या झूठी कथा-किन्व्दन्तियिओं को भी तोड़ना है, जिसे ज्ञान के बिना आप तोड़ने में सक्षम नहीं होंगे, इसलिए अधिक से अधिक आप हर तरह का ज्ञान प्राप्त करके इस झूठे इतिहास से अपने सच्चे इतिहास को उजागर करो. यह आप सबका पुनीत कर्तव्य होना चाहिए.         
                आपका यह इलाका, जहाँ पर यह सभा हो रही है, इस समय राजस्थान के सिरोही जिले में आता है. यहाँ बहुत प्राचीन समय से मानव-बस्तियां बस चुकी थी, इस बात के साहित्यिक और ऐतिहासिक प्रमाण है और इस बात के भी प्रमाण है कि यहाँ पर किसी समय ‘मेग’ और मैणा लोगों का बाहुल्य था और इस क्षेत्र पर उनका अधिकार था. आबू-पर्वत पर हुए अग्नि-कुण्डीय यज्ञ के बाद यहाँ के वाशिदों का आधिपत्य धीरे-धीरे कम होता गया और अंत में या तो यहाँ से विस्थापित हो गए या पराधीन-प्रजा के रूप में आप लोग जीवन-यापन को मजबूर हुए. प्राचीन इतिहास के अध्ययन से यह जानकारी मिलती है कि सिरोही राज्य का प्राचीन नाम अर्बुददेश था, जिसका उल्लेख पालि-साहित्य और पुराण आदि में मिलता है. प्रांत, जब से सिरोही नगर बसाया गया, तब से इस राज्य को सिरोही के राज्य से जाना जाने लगा. यह शहर जिस पर्वत श्रेणी के नीचे बसा है, उस पर्वत श्रेणी का नाम ‘सिरणवा’ है. इस कारन से इसका नाम सिरोही पड़ा. पुराणी कविताओं में सिरणवा ही नाम मिलता है. आबू पर्वत और गुरु शिखर इसकी शोभा है. इस प्रदेश में बनास, सूकली ( नाणा के पास की ), खारी, कृष्णावती और सूकली ( पोइतरा से पालनपुर ) आदि नदियाँ बहती है. आबू का नखी तालाब, हालाँकि छोटा है पर प्रसिद्द है. यहाँ हरियाली है और आब-हवा अच्छी है. यहाँ विभिन्न धर्मो और जातियों के लोग रहते है. अधिकतर लोग खेती करते है. यहाँ क़तर, छुरी, भाला, तीर, कमान बनते है और यहाँ की तलवार तो सरे भारत में प्रसिद्द है. यहाँ कई गांवों में रेजे का कपडा बुना जाता था. खराड़ी, शिवगंज, पींडवाड़ा, रोहेडा, और सिरोही आदि यहाँ के व्यापारिक केंद्र है. यहाँ के लोग गुजराती मिश्रित मारवाड़ी बोलते है. रेलवे, सडके, स्कूलें, मदरसे डाकखाने, बैंकें आदि भी कई जगहों पर है. सिरोही में जैनों का ‘देरासेरी’ नाम से प्रसिद्द जैन मंदिरों का समूह है, सारनेश्वरजी का मनदिर भी सिरणवा की पहाड़ी की तलहटी में आया हुआ है. पींडवाडा में लक्ष्मीनारायण का पुराना मंदिर है, जो पहले सूर्य-मंदिर था. यहाँ मिले एक लेख से इस गाँव का पुराना नाम ‘पिंडरवाटक’ लिखा मिलता है.
                 पींडवाडा के दक्षिण में अजारी गाँव आया हुआ है, वहां गोपालजी का पुराना मंदिर, महावीर स्वामी का जैन मंदिर और जैन मंदिर के अन्दर ही सरस्वती की मूर्ति है, जिसके नीचे विक्रमी संवत 1269 ( ई. सं. 1212 ) का लेख है, यहान पर मेघवालों की पुराणी एक बड़ी धर्म-शाला है, जहाँ पर आज भी साल में एक बार इस परगने के मेगवालों की पंचायत जुड़ती है. अजारी के पास ही मारकंडेश्वर का शिवालय है. अजारी के से 3 मील दक्षिण में वसंतगढ़ है, जिसे वसंतपुर,  वातपरागढ़, वसंतपुरगढ़ आदि भी कहते आये है. यहाँ पर सबसे पुराना शिलालेख विक्रमी संवत 682 ( ई. सं. 625 ) का मिला है. यहाँ मिले शिला लेख से ही मालूम होता है की यहाँ पर वर्मलात का राज्य था, जिसकी राजधानी भीनमाल थी. यहाँ मिले एक लेख में इस गाँव का नाम वैटपुर और वशिष्ठ्पुर लिखा मिलता है. यहाँ भी जैन मंदिर और सूर्य मंदिर के अवशेष और मूर्तियाँ मिली है. रोहेडा गाँव में भी सूर्य मंदिर की मुर्तिया मिली है. विष्णु मंदिर, राजेश्वर मंदिर और शिवालय आदि है.वासा गाँव में भी सूर्य मंदिर और शिवालय है, जिसके द्वार पर जैन मूर्ति है. नितोरा गाँव में भी सूर्य मंदिर था. कायंद्रा गाँव में भी सूर्य की मूर्तियाँ और मंदिर हा, पींडवाडा से उत्तर-पश्चिम में 4 मील की दूरी पर वाणवारजी ( बामणवारजी ) का प्रसिद्द जैन मंदिर है. झाडोलो गाँव में भी पुराना शांतिनाथ का जैन मंदिर है.
                आबुरोड स्टेशन से करीब 4 मील दक्षिण में चन्द्रावती नाम की प्रसिद्द और प्राचीन ‘चन्द्रावती; नगरी के खंडहर मिलते है. यहाँ पर अब पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई किये जाने की सूचना है. इसके अलावा मूंगथला गिरवर, दातानी, निम्बोरा, वर्माण, कूसमा, धाँधपुर, हाथल, असावा, टोकरा, सणपुर, एरनपुर, शिवगंज, आबू आदि कई गाँवों में जैन और हिंदूओं के मंदिर मिलते है. आज भी सिरोही जिले में जगह-जगह पर सूर्य के मंदिरों के बिखरे हुए खँडहर मिलते है. हणादरा के आस-पास भी कई अवशेष मिलते है. यहाँ, जैन मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, क्रोड़ीधज मंदिर और सूर्य का मंदिर भी मिलता है. लाखाव गाँव में लक्ष्मी नारायण का मंदिर, देवांगणजी के मंदिर में विष्णु की बड़ी मूर्ति मिलती है. यहाँ दो नृसिंह अवतार की और अनेक देवियों की मूर्तियाँ मिलती है. कमालाशन पर बैठी हुई विष्णु के बुद्ध अवतार की एक सुन्दर मूर्ति भी यहाँ मिलती है. इस प्रकार से इस पुरे इलाके में सूर्य की मुर्तियांम मिलने से साफ़ हो जाता है कि यहाँ के राजा और प्रजा सूर्योपासक रहे होंगे. यह सूर्य-पूजा निश्चित रूप से विदेशी लोगों के यहाँ बसने से ही प्रचलन में आई और ज्योही राजा लोगों ने वैदिक धर्म अपना लिया, त्योही इन मंदिरों की उपेक्षा होने लगी. उनकी जगह विष्णु और लक्ष्मी नारायण आदि के मंदिर बनने लगे. आबू-पर्वत पर हुए अग्नि कुंड यज्ञ के बाद ही यह बदलाव संभावित लगता है.       .                                     
                किसी समय यह क्षेत्र सिंध के आधिपत्य में था और जैसा कि जनरल अलेक्जेंडर कन्निंघम महोदय ने ऐतिहासिक शोध करते हुए बताया कि सतलज और उसके आस-पास की नदियों के इलाको में मेग (मेघ) लोग बसे थे और वहां उनका राज्य था. इससे इस बात की पुष्टि होती है कि इस इलाके में भी मेगों का राज्य रहा होगा. लेकिन हम जानते है कि यहाँ पर देश की आजादी से पहले देवड़ा वंश के चौहानों का राज्य था और देवड़ों का इस राज्य पर पूरा अधिकार वि. संवत 1368 यानि की ईसवी सन 1311 के आस-पास हुआ तो इस से पहले इस भू-भाग पर किसका अधिकार या राज था, यह हम लोगों को जानना चाहिए. इस जानकारी में ही आपका इतिहास छुपा है, जिसे चालाक लोगों ने खुर्द-बुर्द कर दिया है.   
                भारत के वर्तमान ज्ञात इतिहास से हमें मालूम होता है कि ई. पूर्व 321 के आस-पास मौर्य ( मोरी ) वंश का संस्थापक महाप्रतापी राजा चन्द्रगुप्त नंदवंश को नष्ट कर क्रमशः सिन्धु से गंगा के मुख तक और हिमालय से लगाकर दक्षिण तक के देश का अर्थात सारे उत्तरी भारत का स्वामी बना, सारा राजपुताना भी उसके राज्य के अधीन था. राजस्थान में जयपुर के वैराट नामक प्राचीन नगर में, काठियावाड में जूनागढ़ के पास एक चट्टान पर, गिरनार में  और कई जगहों पर चन्द्रगुप्त के पौत्र अशोक के शिलालेख मिल चुके है, जो इन इलाकों में उनके राज्य-शासन की पुष्टि करते है. मौर्य वंश बौद्ध-धर्म को मानने वाला वंश था, यह बात भी प्रमाणित है और उसकी प्रजा भी लोक-धर्म यानि की बौद्ध-धर्म को मानने वाली थी. ऐसे में मेघ लोग इस भू-भाग के पुराने वाशिंदे है, तो निश्चित रूप से वे पुराने समय में बौद्ध-धर्म को मानने वाले रहे है, इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता है. इस बात के प्रमाण यूनान और ईरान के इतिहास में भी मिलते है.
                जब सिकंदर ने सिन्धु-नदी के मुहाने में बसे प्रदेशों पर आक्रमण किया तो उस समय तक्षशिला और सतलज आदि नदियों के भू-भागों पर मेघों का आधिपत्य था, इस बात के उल्लेख यूनानी इतिहासकारों ने किया है, जिसका जिक्र पुरातत्व-वेत्ता अलेक्जेंडर कन्निंघम महोदय ने आर्क़ायियोलोजिकल सर्वे रिपोर्ट्स में किया है. भारतीय इतिहास की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने वाला भी सिकंदर के बाद सीरिया के राजा सेल्यूकस निकेटार और चन्द्रगुप्त की संधि के बारे में अवश्य जानता है. पुराणों में ईर्ष्या और द्वेषवश  इन राजाओं को हीन या शूद्र मानकर वर्णित किया गया है और यही हाल आपकी जाति के साथ भी इन चालाक लोगों ने किया है. यूनान के इतिहास में एंटीओकस सोटर बादशाह का नामोल्लेख होता है, जिसका सम्बन्ध भी मेग कहे जाने वाले लोगों से होना बताया जाता है, उसका राज्य सिन्धु से लेकर सीरिया तक था. यह राजा बिन्दुसार का समकालीन था. अशोक के एकाधिक शिलालेखों में भी मेगस राजा का उल्लेख है. आज की मेग या मेघ जाति का इन प्राचीन मेग नामधारी राजाओं से क्या सम्बन्ध है, इस बात का विश्लेषण मैंने अन्यत्र करने की कोशिश की है और साथ ही यहाँ पर यह सब बताने का न तो उपयुक्त अवसर है और न समय ही है, परन्तु मोटी-मोटी बात यह है कि आज की यह दीन-हीन मेग (मेघ, मेघवाल ) जाति किसी समय इस भू-भाग की मालिक थी. इस बात को आप लोगों को समझ लेना चाहिए और ब्राह्मणी शास्त्रों में और हिन्दुओं के व्यहहार में आपके प्रति जो घृणा का भाव और अछेप का ठप्पा लगाया गया है, वह इन्ही ऐतिहासिक कारणों की वजह से है, जिसे आप लोगों को अपनी बुद्धि-बल से उखाड़ फेंक देना चाहिए.
                अशोक के बाद इस इलाके पर उसके पुत्र कुणाल या सुयशा का और सम्प्रति आदि मौर्य राजाओं का राज्य रहा. इस वंश के अंतिम राजा वृहद्रथ को मारकर उसका सेनापति पुष्यमित्र राज्य का स्वामी बनता है, परन्तु इस भू-भाग पर उसके अधिकार होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है, बल्कि 8वीं शताब्दी तक राजस्थान के विभिन्न भू-भागों पर मौर्य राजाओं के शासनारुढ़ होने के कई प्रमाण मिलते है. ईसा की पहली-दूसरी शताब्दी में ईरान के उत्तरी प्रदेश से सत्रप कहे जाने वाले लोगों का भारत पर आक्रमण हुआ और काठियावाड़, कच्छ, मारवाड़, मेवाड़ आदि इलाको पर विजय पाकर उन्होंने यहाँ राज्य किया. सिरोही और आबू आदि प्रदेशों पर भी उनका अधिकार था. उनके कई राजाओं के शिलालेख और सिक्के यहाँ मिले है. सिरोही राज्य में उनके चांदी के सिक्के मिले है. ये राजा भी यहाँ आकर बौद्ध-धर्मानुयायी हो गए और उन में से कुछ वैदिक धर्म के अनुयायी भी हुए. तात्पर्य यह है कि गुप्त वंश की उत्पति से पहले तक सिरोही प्रदेश में बौद्ध-धर्म का बोल-बाला था. यहाँ के राजा और प्रजा बौद्ध धर्म के अनुयायी थे. इतिहास से यह भी जानकारी मिलती है कि अशोक के समय से बौद्ध धर्म की जो उन्नति होने लगी थी, वह गुप्त वंश के सुदृढ़ होने के साथ क्षीण पड़ने लग गयी. यही वह संक्रांति-काल है. जिस में आज की अनुसूचित जातियों का पराभव होना शुरू हुआ. महेन्द्रादित्य उपाधि-धारी राजा के मोर चिन्ह वाले दो चांदी के सिक्के सिरोही राज्य में मिले है और अगर यह प्रमाणित हो जाय कि महेंद्रादित्य का सम्बन्ध गुप्त वंश से था तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि गुप्तवंश का इस इलाके में आधिपत्य रहा होगा.
                गुप्त-वंश के अंतिम राजा कुमारगुप्त या उसके पुत्र स्कंदगुप्त के समय इस प्रदेश पर मध्य एशिया में रहने वाली एक अन्य जाति का आक्रमण होता है. ये लोग संस्कृत साहित्य में अधिकांश-रूप से हुण कहे गए है. हुण राजाओं के सिक्के भी सिरोही क्षेत्र में मिले है, सिरोही के लोग इन सिक्कों को गदिया या गधिया सिक्के कहते आये है. इस से यह साबित होता है कि पांचवीं-छठी शताब्दी में सिरोही पर हूणों का अधिकार था. उसके बाद नेपाल से लेकर नर्मदा पर शासन करने वाले महाप्रतापी शिलादित्य या महाराजा हर्ष का सिरोही पर अधिकार रहा, उसका बड़ा भाई राज्यवर्धन और स्वयं हर्षवर्धन सौगत यानि बुद्ध के परम उपासक थे. उसके समय में चीनी यात्री ह्वेनसांग बौद्ध-धर्म के ग्रंथों की खोज में भारत आया था, जिसके यात्रा-वृतांत में भी इनका उल्लेख है. हर्षवर्धन के बाद सिरोही पर भीनमाल के किन्हीं ‘चाप’ वंश के लोगों का शासन रहा. बसंतगढ़ में ईस्वी सन 625 ( विक्रमी संवत-६८२ ) का एक शिलालेख मिला, जो किसी वर्मलात राजा के समय का है. जिस के सामंत राज्जिल को अर्बुद देश का स्वामी बताया गया है. स्पष्ट बात यह है कि इस समय तक भी सिरोही में किसी स्वतंत्र राज्य की स्थापना नहीं हुई थी, यह प्रदेश उस समय गुर्जर-देश के तहत ही आता था. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भीनमाल को गुर्जर देश की राजधानी बताया है.
                उसके बाद  आबू के वास्तुपाल मंदिर की प्रशस्ति, जो विक्रमी सन 1287 ( ईस्वी सन 1230 ) की है, उससे ज्ञात होता है कि उस समय यह क्षेत्र परमारों के अधीन चला गया था. उसके बाद सिरोही पर मेवाड़ के गुहिल वंश के राणा कुम्भा का आधिपत्य रहा. उसने सिरोही राज्य के आबू और वसंतगढ़ के किले पर अधिकार कर लिया था और आबू पर अचलगढ़ का किला बनवाया. उसने अचलेश्वर के मंदिर के निकट कुम्भस्वामी का मंदिर और उसके पास एक तालाब का निर्माण भी कराया. वसंतगढ़ का किला भी इसी का बनाया हुआ माना जाता है. इसका एक ताम्र-पत्र विक्रमी संवत 1494 ( ईस्वी सन 1452 ) का सिरोही में मिला है, जिस में अजाहरी परगने की चुरडी (सवरली ) गाँव में भूमि देने का उल्लेख है, इससे यह प्रमाणित है कि महाराणा कुम्भा ने उस संवत से पहले सिरोही के इन स्थानों को अपने अधीन कर लिया था. उसके बाद गुजरात के सुल्तान कुतुबद्दीन तथा मालवा के सुल्तान महमूद ने महाराणा कुम्भा पर चढ़ाई की, उस समय यह परगना मेवाड़ के आधिपत्य से निकल गया. औरंगजेब के समय मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह ( द्वितीय ) ने सिरोही को मेवाड़ के अधीन करने के लिए औरंगजेब से फरमान करवाया, परन्तु उस समय यह मेवाड़ के अधीन नहीं जा सका. इस इलाके पर पडीयारों और पंवारों के अधीन होने के भी प्रमाण मिलते है और सोलंकियों के भी. कुल मिलाकर सच्चाई यह है कि आपका या प्रदेश विभिन्न राजवंशों के अधीन रहा है.
                सोलंकी राजा जयसिंह, ( सिद्धराज जयसिंह ) का नाम गुजरात के इतिहास से और यहाँ के इतिहास से घनिष्ठ रूप से जुडा है और आपकी जाति से भी जुड़ा है. गुजरात के जो मेगवाल है, उन में से कई अपने आपको ‘मायो मेघ’ का वंशज मानते है. कई सन्दर्भों में यह कहा गया है कि पाटन के सहस्राहार तालाब में पानी नहीं रुकता था, तो माया मेघ ने वहां अपना जीवन दिया और उसके बाद पानी रुकने लगा. कई जगह यह लिखा है कि मायो मेघ सिद्धराज जयसिंह का भाई था और कईं जगह पर उसको सिद्धराज जयसिंह की प्रजा का बताया गया है, परन्तु यह तय है कि उस समय गुजरात के उस क्षेत्र में और आपके क्षेत्र में भी, क्योंकि आपका यह क्षेत्र उस समय उसके अधीन था, मेग लोगों पर विपत्ति थी. उसके और उसके लोगों के साथ दोयम दर्जे का बर्ताव होता था. माया मेघ ने अपने शरीर का बलिदान देने से पहले सिद्धराज जयसिंह से बंदिशों को हटाने का वचन लिया और अपने प्राणों की आहुति दी. यह ग्यारहवीं-बाहरवीं शताब्दी की घटनाएँ है. जयसिंह के बाद उसका वंशज राजी का पुत्र मूलराज जब अन्हिल्वाडा का राजा बना तो सिरोही के परमारों ने गुजरात के सोलंकियों की पराधीनता स्वीकार कर ली थी, उस समय आबू का राजा मूलराज की सेना में कारिन्दा था, लेकिन उसके बाद गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव और उसके सामंत आबू के परमार धन्धुक के बीच अनबन हो गयी और धन्धुक मालवा के राजा भोज के पास चला गया. उस समय भीमदेव ने गुजरात से विमलशाह को अपनी तरफ से आबू का दंडनायक नियुक्त करके भेजा. जिसने बुद्धिमानी से धन्धुक को चितौड़ बुलाया और भीमदेव को धन्धुक से प्रसन्न करवाया. विमलशाह ने अर्बुदा देवी के प्राचीन मंदिर के करीब एक मील उत्तर-पूर्व में जैन मंदिर बनवाया. इस मंदिर में मुख्य मूर्ति रिखबदेव ( आदिनाथ ) की है, जिसे आज-कल  देलवाडा के मंदिर के नाम से जानते है. यहाँ अन्य मूर्तियाँ भी है, जिसमें घोड़े पर सवार के रूप में विमलशाह की मूर्ति मौजूद है और हाथियों की मूर्तियाँ भी है. इन पर खुदे एक लेख में विक्रमी संवत 1205 ( ई. सं. 1149 ) के लेख में कई लोगों के नाम है, जिन में जगदेव पंवार का भी एक नाम है. एक लेख में विक्रमी संवत 1237 ( ई. सं.1180 ) की तिथि है. यहाँ के जो परमार मेघवाल है, वे अधिकांशतः अपने को जगदेव पंवार का वंशज मानते है. जो भी हो, ये सब घटनाएँ और तारीखे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आपके इतिहास को समेटे हुए है, उसे आप लोगों को उजागर करना चाहिए. 
                 आबू के देलवाडा मंदिर की हस्तिशाला के बाहर परमारों से आबू का राज्य छीनने वाले चौहान महाराज लुंढा ( लुम्भा ) के दो लेख भी यहाँ मिले है, जिनमें एक विक्रमी संवत 1372 ( ई. सं. 1316 ) व दूसरा विक्रमी संवत 1373 ( ई. सं. 1317 ) का है, बघेल राजा सारंगदेव का विक्रमी संवत 1350 ( ई. सं. 1294 ) का भी एक शिलालेख मिलता है. इस से यह तय होता है कि उस समय यह चौहानों के अधीन था. देलवाडा के मंदिरों में लूणवसही नामक नेमिनाथ का मंदिर भी प्रसिद्द है, जिसे वास्तुपाल के छोटे भाई तेजपाल द्वारा निर्माण किया हुआ कहा जाता है. जिस समय गजनी के सुल्तान महमूद ने सोमनाथ मंदिर को लूटा, उस समय मालवा में राजा भोज का राज्य था और अनंहिलवाडे पर भीमदेव का. भीमदेव के बाद उसका बेटा कर्ण राज्यारूढ़ हुआ, जिसके कोलियों, भीलों और मेगों से कई बार युद्ध हुए. इसके बाद सिद्धराज सोलंकी राजा हुआ, उसके समय भी यही स्थिति थी, जिसे इतिहासकारों ने उपद्रव कहकर उसको इतिहास के गर्त में डाल दिया. जयसिंह के बाद कुमारपाल सोलंकियों में प्रतापी राजा हुआ, वह बौद्ध धर्म को मानता था और अंत में हेमाचार्य के उपदेश से जैन धर्म स्वीकार कर लिया था. जब गुजरात पर शहाबुद्दीन गोरी ने आक्रमण किया तब अजयपाल के पुत्र मूलराज (द्वितीय ) का राज था. सहाबुद्दीन गौरी से युद्ध आबू के नीचे लड़ा गया और सुल्तान घायल हुआ और हारकर भाग गया. उसके बाद भीमदेव ( द्वितीय ) के राज में कुतुबुदीन ऐबक ने गुजरात पर चढ़ाई की और आबू के नीचे परमार धारावर्ष तथा कईं अन्य राजाओं ( सामंतों ) ने बड़ी सेना के साथ उसका मुकाबला किया, परन्तु उन सबको हरा कर कुतुबद्दीन आगे बढ़ गया और गुजरात को लूटा.
                 सिरोही पर देवड़ो का राज्य स्थापित करने वाले लुम्भा का एक शिलालेख विक्रमी संवत 1377 ( ई. सं. 1320 ) का आबू पर अचलेश्वर मंदिर में घुसते हुए बाहर की तरफ दाहिनी ओर लगा हुआ मिलता है. यह माना जाता है कि लुम्भा ने परमारों से आबू तथा चन्द्रावती छीनकर चौहानों का नया राज्य स्थापित किया, जो आजादी से पहले ‘सिरोही राज्य’ के नाम से जाना जाता था. इससे यह तय होता है इस समयावधि में ही सिरोही में देवडो के राज्य की नींव पड़ी. देवड़ा चौहानों की ही एक शाखा मानी जाती है. चौहानों के राज्य उस समय तक और भी कई जगहों में स्थापित हो चुके थे, जिन में अहिच्छ्त्रपुर, सपादलक्ष ( शाकम्भरी यानि सांभर ), नाडोल, अजमेर आदि का उल्लेख मिलता है. नाडोल के वंश में ही सिरोही, बूंदी और कोटा के राजा है, ऐसा माना जाता है.
                सिरोही के देवड़ा चौहानों की उत्पति को लेकर कोई एक मत नहीं है और तेरहवीं शताब्दी के बाद की भाटों की बहियों में इनकी उत्पति का जो उल्लेख मिलता है, वह ज्यादातर विश्वास योग्य नहीं है. सिरोही की ख्यात में लिखा है कि राव मानसिंह के पुत्र का नाम देवराज था, जिसके नाम पर उसके वंशज देवड़ा कहलाये. सूर्यमल्ल मिश्रण के ग्रन्थ ‘वंश भास्कर’ में लिखा है कि माणकराव चौहान के बेटे निर्वाण के वंश में देवट नाम का पुरुष हुआ, जिसके वंशज देवड़ा कहलाये. मुत्ता नेणसी की ख्यात में लिखा है कि नाडोल के राव लाखणसी के वंश में आसराज हुआ, उसके रूप और शौर्य से मोहित होकर देवी उसकी स्त्री होकर रही, जिसके पुत्र देवी के नाम से देवडे कहलाये. इन सब में ध्यान देने वाजी बात यह है कि इनकी उत्पति के बारे में इस प्रकार की विभिन्न कथा-क्विन्दंतियाँ का न तो आपस में कहीं मेल है और न सम-सामायिक घटनाओं या तथ्यों से ये प्रमाणित होती है. नाडोल के चौहानों का राज उनके ही जालोर राज्य में मिल गया और जालोर के राजा उदेसिंह का भाई मानसिंह हुआ, जिसका बेटा प्रताप सिंह हुआ, जिसे बडवे देवराज नाम लिखते है और देवड़ा शाखा की उत्पति उसी से बताते है. प्रतापसिंह के बीजड और बीजड से लुम्भा हुआ, जिसने सिरोही में देवड़ों का राज्य स्थापित किया.
                लुम्भा के राज्य-स्थापन की सूचना देने वाला एक शिलालेख आबू के अचलेश्वर मंदिर में लगा हुआ मिलता है, जिसमें लिखा है कि इसने अपने प्रताप से चन्द्रावती तथा अर्बुद ( आबू ) का दिव्यदेश प्राप्त किया. सिरोही के बडवे की किताब में यह घटना विक्रमी संवत 1368 ( 1311 ) को हुई होना लिखा है. ध्यान देने वाली बात यह है कि मुत्ता नैणसी की ख्यात और बडवों की पुस्तकों में उस राजा को हुण लिखा हुआ है. लुम्भा ने हुण राजा से कैसे राज्य हथियाया, इसका भी रोचक वर्णन इनकी किताबों में मिलता है. कहा गया है कि आबू का राजा हुण परमार था और उसका बड़ा कुटुंब था. उसके कई बेटे और भाई कुंवारे थे. उनकी कहीं शादी नहीं हो रही थी. एक चारण ने राजा को उनकी देवड़ो की लड़कियों से शादी कराने की बात कही और बात पक्की हो गयी. उस समय देवडे हुण राजा के अधीन ही थे और समय-समय पर उपद्रव करते रहते थे. हुण राजा ने कहा कि ये विश्वास योग्य नहीं है, इसलिए इनके साथ सम्बन्ध सोच-विचारकर करना चाहिए. यह तय हुआ कि देवडों के पाँचों भाईयों ( ख्यातों में बीजड के 5 बेटे होना लिखा है ) में से कोई एक भाई आबू पर उनकी ( हुण राजा की ) ओल में आ जावे तो शादी कर लेंगे. उस समय लुम्भा चारण के साथ आबू के हुण राजा के दरबार में गया और यह शर्त मान ली गयी. हुण राजा के भाईयो और बेटों की बारातें देवडों के वहां गयी. लुम्भा हुण राजा के पास ही रहा. चौहानों ने अपनी योजना के अनुसार 25 लड़कियों की जगह 25 लड़कों को लड़कियों के कपडे पहना कर तैयार किया और उनको समझा दिया कि फेरों के समय परमारों को एक साथ कटारों से मार देना है .
               इस षड्यंत्र का पता आबू के हुण राजा को नहीं था. हुण परमारों के 25 दुल्हे बारात के साथ ब्याहने गए तो चौहानों ने उनका बड़ा सत्कार किया और सबको खूब शराब पिलाकर गाफिल कर दिया. बाद में दुल्हों को फेरों के लिए अन्दर ले गए और बारातियों को बाहर ही रखा. ज्योही दुल्हे अन्दर गए लड़कियों के भेष में छुपे हुए चौहान लड़कों ने उनका क़त्ल कर दिया. उसी समय बाहर बैठे बारातियों का भी बाहर वाले चौहानों ने क़त्ल कर दिया. यह बताया गया है कि उस समय कोई परमार जिन्दा नहीं बचा. इस मार-काट के बाद वहां से एक जना आबू गया और हुण राजा के दरबार में पहुंचा. लुम्भा वहां पर हुण राजा से बात कर रहा था, सन्देश-वाहक से लुम्भा ने पूछा कि शादी में यश किसको मिला? संदेशवाहक ने उत्तर दिया कि चौहानों को. यह सुनते ही लुम्भा ने निश्चिन्त हुए बैठे हुण महाराजा का वहीँ क़त्ल कर दिया और आबू को अपने कब्जे में ले लिया. यह घटना आबू के नीचे बाड़ेली गाँव में हुई बताते है. यह संभव है कि उस समय अपना राज्य बचाने   के लिए परमार लड़े हो और लड़ाई में मारे गए हो, जो भी हो, उस समय आबू पर लुम्भा का अधिकार हो गया. लुम्भा ने अचलेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया तथा हेठुंजी गाँव अचलेश्वर मंदिर को अर्पण किया. ऐसा वृतांत मिलता है. विक्रमी संवत 1377 ( ई. सं. 1320 ) के अंत के आस-पास लुम्भा की मौत हुई और उसका पुत्र तेजसिंह उसका उत्तराधिकारी हुआ, जिसकी राजधानी चन्द्रावती नगरी थी.
                तेजसिंह के समय वशिष्ठ ऋषि के मंदिर का उल्लेख होता है. उसके विक्रमी संवत 1393 ( ई. सं. 1336 ) के शिलालेख से ज्ञात होता है कि इसने झाबटू (झाँबतूं ), ज्यातुली और तेजलपुर ( तेलपुर ), ये तीन गाँव वशिष्ठ मंदिर को अर्पण किये थे. इसके बेटे कान्हड़देव ने आबू पर प्रसिद्द वशिष्ठ के मंदिर का नया निर्माण कराया और वीरवाडा गाँव को इस मंदिर को भेंट किया. कान्हड़देव का एक शिलालेख विक्मी संवत 1394 ( ई. सं. 1337 ) का वशिष्ठ के मंदिर में मिला है और दूसरा विक्रमी संवत 1400 ( ई. सं. 1343 )  का अचलेश्वर के मंदिर में लगी कान्हड़देव की मूर्ति के नीचे खुदा हुआ है, इसके बाद सामंतसिंह हुआ, जिसने भी वशिष्ठ के मंदिर को लुहुली, छापुली ( सापोल ) और किरणथला के तीन गाँव भेंट किये. सामंतसिंह के बाद सलखा आबू का राजा हुआ, उसके पौत्र शिवभाण ( शोभा ) ने सिरणवा नाम की पहाड़ी के नीचे विक्रमी संवत 1462 ( ई. सं. 1405 ) में एक शहर बसाया और उस पहाड़ी पर एक किला बनवाया. वह शहर महाराव शिवभाण ( शोभा ) के नाम से शिवपुरी कहलाया, जो वर्त्तमान सिरोही से अनुमानतः 2 माइल पूर्व में खँडहर स्वरुप अब तक विद्यमान है, जिसको लोग पुराणी सिरोही कहते है. शिवभाण के बेटे सैसमल ( सहस्रमल्ल ) ने विक्रमी संवत 1482 ( ई. सं. 1425 ) के वैसाख सुदि बीज को वर्त्तमान सिरोही नगर बसाया और चन्द्रावती नगरी को छोड़कर सिरोही को नई राजधानी बनाया. तब से यह प्रदेश सिरोही राज्य के नाम से जाना जाने लगा.
                अभी तक यह जो बताया गया है, वह इस भू-खंड के प्राचीन अज्ञात इतिहास से लेकर सिरोही बनने और यहाँ पर देवडों के राज स्थापित होने तक की मुख्य-मुख्य घटनाओं से सम्बंधित है, जो आपके प्राचीन इतिहास की जानकारी जुटाने के लिहाज से महत्वपूर्ण है. इस विगत से यह बात तय होती है कि 14वीं-15वीं शताब्दी से पहले का यहाँ का इतिहास गडमगड है, जिसे बाद के राज-कारिंदों ने अपने हित में ढाल कर कड़ी से कड़ी मिलाकर अपना झूठा इतिहास दुनिया के सामने रखा, जो न तो तर्क की कसौटी पर खरा उतरता है और न ऐतिहासिक या पुरातात्विक साक्ष्यों से पुष्ट होता है. राजस्थान के विभिन्न इलाकों में देश के आजाद होने से पहले राजपुत कहे जाने वाले लोगों का राज था, जिसे देशी रियासते कहा जाता था और तकरीबन सभी अंग्रेजों के अधीन या उनके गुलाम थे. राजपुत कहे जाने वाले इन लोगों ने अपनी सूझ-बुझ, शौर्य और साम, दाम, दंड, भेद आदि से यहाँ अपने राज्य स्थापित किये, इसमें कोई शक नहीं है.
                 आजादी से पहले राज-काज करने वाले ये लोग एक ही जमात या एक ही धर्म या एक ही जाति-बिरादरी से नहीं होते हुए भी अपने हितों के लिए एक होकर यहाँ की धरती के आम हकदारों के साथ दोयम दर्जे का बर्ताव करते रहे. इनके हाथों में राज-काज आ जाने के बाद इन्होने अपने-अपने वंश और जाति को प्राचीन क्षत्रिय लोगों से जोड़ कर भारत के प्राचीन इतिहास पर भी डाका डाला. प्राचीन क्षत्रियों का इन से कितना लेना-देना है, यह बात इतिहास के विश्लेषणात्मक व तुलनात्मक अध्ययन से पता लग जाती है. यहाँ पर उन सब पर चर्चा करना उपयुक्त नहीं हैं, बल्कि आप लोगों को यहाँ यह जानना जरुरी है कि ‘राजपूत’ शब्द प्राचीन नहीं है और इसका प्रयोग मध्य-काल में होने लगा था, जब ऐसे लोग राज-सत्ता पर काबिज होने लगे; जिनका भारत के प्राचीन राज-वंशों से कोई सम्बन्ध नहीं था तो राजपूत शब्द प्रचलन में आया. प्राचीन भारत में, चाहे वह वैदिक परंपरा रही हो या गैर-वैदिक श्रमण परंपरा, उनमें  शासन करने वाले अंग को क्षत्रिय कहा गया. मैं इस शब्द की उत्पति और अन्य दूसरे पक्षों पर नहीं जाना चाहता हूँ, बल्कि यह बताना चाहता हूँ कि बाद में शासन करने वालों को क्षत्रिय न कह कर राजपूत क्यों कहा गया, क्योंकि ये लोग न तो उस प्राचीन राज-वंशो से थे और न ही वैदिक धर्म के वर्ण-वादी घेरे से थे, अतः वैदिक लोगों ने इनको अपने समाज में खपाने के लिए नया नाम ‘राजपूत’ दिया. प्राचीन क्षत्रिय आदि इनकी प्रजा के रूप में पराधीन होकर अपने इतिहास और परम्पराओं को ही भूल गए, जिसमें आपकी जाति जैसी कई अन्य जातियां भी है.
                 यह स्पष्ट होता है कि मध्य-काल में शासकों के लिए एक नया नाम ‘राजपुत’ प्रचलन में आ गया था. इन राजपूतों की उत्पति के सम्बन्ध में कई तरह के मतवाद है. अधिकांशतः सभी मत राजपूतों को विदेशी बताकर, ‘राजपूतों की विदेशी उत्पति’ के सिद्धांत को प्रमाणित करते है, वहीँ कुछ मत इनको आबू पर्वत पर हुए अग्नि-कुंडिय यज्ञ से उत्पन्न हुआ मानते है. जो भी हो, ये प्राचीन राज-वंशो के वंशधर नहीं ठहरते है, परन्तु इनके भाट-चारणों ने, जब सत्ता इनके हाथों में आ गयी, तो बड़े उत्साह से इनका सम्बन्ध प्राचीन राजवंशों से जोड़कर कई रिक्तताओं को भरने की कोशिश की और इन्हें एक ओर वैदिक धर्म में खपाया, वहीँ दूसरी ओर उन्हें प्राचीन गौरव का उत्तराधिकारी भी बनाया. यह सब धीरे-धीरे सुनियोजित तरीके से हुआ. इन कारगुजारियों में इन नवोदित विजेता जातियों ने पराभव को प्राप्त मेग, मैणा, कोली और भील जैसी कई जातियों के न केवल राज्य हड़पे, बल्कि इतिहास के पन्नों से उनका नामो-निशान तक मिटाने का जघन्य कुकृत्य कर दिखाया. यह तभी हो सकता था, जब वे प्राचीन राज-वंशों से युक्ति-युक्त अपना सम्बन्ध जोड़ दे. यह काम ब्राह्मणों और इनके चारण-भाटो ने बखूबी किया, परन्तु इन तथाकथित चारणों या इतिहासकारों ने जहाँ कही भी अपनी सफलता की शेखियां बघारी हैं, उन शेखियों में ही ये अपने कुकृत्यों की छाप छोड़ गए है, जिनसे तार पकड़ कर आप अपना इतिहास ज्ञात कर सकते हो. आप में से जो पढ़े-लिखे लोग है, उनको उन चीजों को समझना चाहिए और हमारी जो साधारण भोली-भाली, अनपढ़ और अज्ञानी जनता हैं, उन्हें इनके बारे में बताना चाहिए और अपने इतिहास के एक एक पन्ने को खोजना चाहिए. इन तथाकथित इतिहासकारों के झूठे इतिहास को जब तक आप चुनौती नहीं देंगे. तब तक आप अपने इतिहास के गौरव को न तो खोज पाओगे और न उस पर गौरव कर पाओगे. इसलिए आप लोगो को इस सम्बन्ध में गंभीरता से सोचना चाहिए और अपने गौरव को खोजना चाहिए.
                आप यह देखिये, कि भारत के इतिहास में राजपूतों की उत्पति उस युग में होती है, जिस समय भारत में किसी एक सशक्त केन्द्रीय शक्ति का नितांत अभाव हो जाता है. भारत में एक केन्द्रीय शक्ति के नहीं रहने से विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न तरह के क्षत्रपों का प्रादुर्भाव होता है और राजपुत भी उन में से एक है. इन नवोदित शक्तियों में कुछ पुराने सामंत थे तो कुछ बिलकुल ही नवोदित थे. ये सभी क्षत्रिय स्तर प्राप्ति के प्रबल इच्छुक थे. भारतीय इतिहास में यह ऐसा समय था, जब बौद्ध धर्म अपने अवसान-काल में था और भारतीय समाज में ‘जाति-संस्तरण’ पुनः महत्वपूर्ण बन गया था. यह जातीय-संस्तरण प्रत्येक व्यक्ति और वर्ग के लिए सामाजिक हैसियत और गरिमा से जुड़ गया था. ऐसे में शासक वर्ग में क्षत्रिय स्तर प्राप्ति की इच्छा का उदय होना स्वाभाविक था. इसे हम यों कह सकते है कि ऐसे में क्षत्रिय स्तर प्राप्ति के इच्छुक वंशों का उदय हुआ, राजपूतों के एक वर्ग या एक जाति के रूप में उभरने के पीछे सामाजिक स्तरीकरण एवं सामाजिक संबंधों की यही प्रक्रिया निहित रही है. इस बात को आप लोगों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि राज करने वाले ये तथाकथित लोग कहीं ऊपर से नहीं टपके है बल्कि आप लोगों को ही पराधीन कर राज-सत्ता पर कब्ज़ा जमाया था. इन्होने अपने को राज-कार्य करने के कारण उच्च माँने जाये, इसके लिए कई प्रशस्तियाँ और वंशावलियों का भी ब्राह्मणों, चारणों और भाटो आदि से सृजन करवाया. उन में कितनी सचाई है और कितनी खोट है, यह आप अपनी बुद्धि से परखने की मेधा प्राप्त कर लोगे, तो उनका झूठ आपको समझ में आ जायेगा और आपकी जो दीन-हीन स्थितियां बनी, वे भी समझ में आ जाएगी.
                   राजपूतों के उदय के समय उपनिवेशन की प्रक्रिया और आर्थिक घटनाओं ने एक ऐसा परिदृश्य घटित कर दिया था, जिसकी परिणिति सामंतशाही और सामाजिक स्तरीकरण के सुदृढीकरणके रूप में हुई. इस समय की जीतनी भी जातियां उत्पन्न हुई, वे उस समय के उपनिवेशन और आर्थिक घटनाओं का आवश्यक हिस्सा थी. इन नवोदित राजपूतों के सामाजिक स्तरीकरण में जाति-व्यवस्था में ऊपर नीचे के क्रम में शुमार होने के लिए राजकीय सत्ता और धर्म की सत्ता ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. सामाजिक स्तर पर कुलों के परस्पर विवाहित संबंधों ने इसको तीव्र गति दी. राजपूतो के वैवाहिक संबंधों का पूरा ताना-बाना इस प्रक्रिया के इर्द-गिर्द घूमाता है. उनकी वंशावलियों को खंगालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इनके वैवाहिक सम्बन्ध अधिकांशतः उन्हीं कुलों के बीच होते थे, जो या तो राजपूत श्रेणी में आ चुके थे या जो किसी न किसी भू-भाग के शासक बन चुके थे, चाहे वे क्षत्रिय है या नहीं है, चाहे वे उनकी धार्मिक मान्यताओं को मानते है या नहीं मानते है, इसका कोई ज्यादा महत्त्व नहीं था. ये वैवाहिक सम्बन्ध सामाजिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए भी होते थे. बाहर से आये हुए शक, हुण या सीथियन. ईरानी-पहलवी आदि कई जातियां इस समय राजपुत बनी और मराठे, सिंदे ( सिंधिया ) आदि जातियां भी इसी समय उभरी, इसी काल में कई जातियों का पराभव भी हुआ. कई ऐसे दृष्टान्त भी है कि किन्हीं कारणों से जो राज-काज में नहीं है या किसी भू-भाग का मालिक नहीं है, उनसे अगर वैवाहिक सम्बन्ध हो जाते थे, तो उन्हें जागीर देकर उसको उस घेरे में ले लेते थे. राजपूतों में जमीनों के प्रति मालिकाने का यह सुरूर इसी अवधि में शुरू हुआ और प्रतिष्ठा का सवाल बन गया, फलतः एक ही कुल के और एक ही वंश के और भाई-भाई या बाप बेटों के झगड़े राजपूतों में सामान्य चीज समझी जाने लगी. वे आपस में निरंतर युद्ध करते रहे और भारत को खंड-खंड करने में कोई कमी नहीं छोड़ी. एक ओर कई विदेशी आक्रमण-कारियों से झगडे तो दूसरी ओर कई विदेशी आक्रमणकारियों को इन्होने आमंत्रित किया. इन सब पर चर्चा का कोई अवसर यहाँ पर नहीं है, परन्तु हमें समझने वाली बात यह है कि इस खंडित इतिहास में हमारे गौरव करने लायक कोई बात नहीं है. हम लोग तब तक एक साधारण प्रजा के रूप में जीवन-यापन की स्थिति में आ गए थे और इनके सामंती दमन-चक्र में पिसने को मजबूर थे.
                राजपूतों के इतिहास से, और सिरोही के इस इतिहास विश्लेषण से यह बात तय होती है कि राजपूतों की उत्पति राजनितिक प्रक्रिया और सामाजिक प्रक्रिया की एक वृहद् घटना है और आज यह जाति विभिन्न वंश, गोत्र, जाति और समूहों का प्रतोनिधित्व करती है. इसे राजनितिक प्रक्रिया की घटना इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इस प्रक्रिया में राजनितिक शक्ति प्राप्त करने वाला व्यक्ति, वर्ग, कबीला या समूह अनेक असम्बन्ध व्यक्तियों, वर्गों, कबीलों, या समूहों और शक्तियों का सहारा लेकर राजनितिक वजूद प्राप्त करता है.राजनैतिक शक्ति प्राप्त करने पर ऐसे अनेक असम्बन्ध वर्ग उन आदर्शों का पालन करते थे, जो तत्कालीन राजनैतिक सिद्धांतों पर छाये हुए थे व जिससे उनको एक पहचान भी मिलती थी. चूँकि इस राजपूत जाति में या राजपुत ढांचे में प्रवेश मुख्य रूप से राजनैतिक शक्ति के माध्यम से होता था, अतः ऐसे नवोदित शासकों में पारस्परिक वैधता, पारंपरिक आदर्श और उनकी वैधता की आवश्यकता बनी रही, जिसे उन्होंने सामाजिक और आर्थिक आधार पर मजबूत किया और हिन्दू धर्म के उच्च वर्ण में समाहित होने में सफल हो गए.
                राजनितिक शक्ति प्राप्त करने से ही सामाजिक स्तरीकरण में यकायक परिवर्तन नहीं आ जा जाता है. अतः ऐसे असम्बन्ध वर्गों को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक था. भारतीय परिवेश में या यों कहे कि वैदिक हिन्दू परिवेश में उसका परिघटन वंशों की सरंचना पर टिका था. हिन्दू वैदिक मान्यता के अनुसार ब्रह्मा की सृष्टि की उत्पति के सिद्धांत के अनुसार इनकी उत्पति को स्थापित करना जरुरी था, अतः विभिन्न राजपूतों की विभिन्न जातियों ने अपने-अपने बडवों, भाटो,चारणों या ब्राह्मणों से अपनी उत्पति की कल्पित रचनायें करवाई, एक ही वंश और एक ही खांप की इन रचनाओं में इनकी उत्पति की अलग-अलग कहानियां इन कल्पनाओं की पोल खोल देती है, फिर भी उस समय ये ऐसा करने और मनवाने में सफल रहे. वैद-वादी या ब्राह्मणवादी विचारों ने उनको घेर लिया और वे पौराणिक कथाओं के नायक रूप में वर्णित किये जाने लगे. जिस अग्नि-कुंड से वशिष्ठ ऋषि द्वारा अग्नि-कुण्डीय राजपूतों की उत्पति बताई जाति है, वह इन राज-सत्ता प्राप्त लोगों का शुद्धिकरण था और इस शुद्धिकरण के द्वारा इन्हें वैदिक या हिन्दू घेरे में समाहित किया गया और उन्हें नया नाम ‘राजपूत; दिया गया. यह घटना आबू-पर्वत पर ही हुई और राव तेजसिंह के समय से पहले हो चुकी थी. इस तथ्य का प्रमाण उसके समय के वशिष्ठ ऋषि के मंदिर के शिलालेखों में देखे जा सकते है. जब इनको गोत्र और वंश का नामकरण मिल गया तो इन्होने अनेक पौराणिक क्षत्रिय वंशों से अत्यंत उत्साहपूर्ण अपने संबंधों का दावा करके वैधता प्राप्त करनी चाही थी, ऐसा इनकी कई वंशावलियों से स्पष्ट होता है. यह राजपूतों के आविर्भाव की एक राजनितिक घटना की सामाजिक घटना में तबदीली थी, जो ग्यारहवीं या बारहवीं शताब्दी के बाद से हमें उनके लेखों आदि से ज्ञात होती है. जो प्राचीन क्षत्रिय वंश था, वह नेस्तानाबूद हो गया और नवोदित राजपूतों ने बीच की खाईयां पटाने के लिए विभिन्न उपक्रम किये ये सब व्यापक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनितिक प्रक्रिया के ही अंग है.
                यह सब आपको यहाँ बताने का मकसद यह है कि आप अपने इतिहास में रूचि जाग्रत करो, उसे खोजो, उसे लिपिबद्ध करो. जिनका इतिहास नहीं होता, उनका अस्तित्व मिट जाता है. सारी दुनिया में और उन्नतिशील जातियों में इतिहास का बड़ा गौरव होता है. राजपूताने में राजपूतों ने अपने में परंपरा के रूप में एक कहावत चला रखी है कि “नाम गीतडों या भीतडों से ही रहता है.” कहने का तात्पर्य यह है कि जिनका इतिहास या चरित्र ऐतिहासिक पुस्तकों में लिखा रहता, इनका बखान गानों, कथा-किंवदंतियों में किया जाता है, या जिनके बनवाये महल-मालिये, मकानात आदि विद्यमान होते है, उन्ही की कीर्ति चिर-स्थायी रहती है. आज हम महान सम्राट अशोक, हर्षवर्धन और जिन राव या महारावों का मैंने जिक्र किया है, उनका पुस्तकों या शिलालेखों आदि में जिक्र होने के कारण ही हम उनको जानते है और ऐसे शख्सियत या चरित्र जिन लोगों से सम्बंधित होते है, उनको गौरव मिलता है, वे उन पर गौरव करते है. आप देखेंगे कि ये लोग अपनी जाति-बिरादरी के किसी भी आदमी ने कुछ भी थोडा-बहुत पुण्य-प्रताप या अच्छा-भला किया है, तो उसका बड़ा बखान करेंगे और उसको बढ़-चढ़ कर चावा करेंगे. उसे कहानियों और गीतों में फेलाकर लोगों को उस ओर आकर्षित करेंगे और काफी समय तक ऐसा करने के बाद ऐसे साधारण लोगों को फिर ये अलौकिकता का आवरण चढ़ा कर देवी-देवता के रूप में महिमा-मंडित कर देते है, और भोले-भाले लोग उनके जाल में फंस जाते है. ऐसे तरीकों और आकर्षण से भी वे अपने इतिहास को जिन्दा बनाये रखते है और हम अपने ही उन लोगों को भूल जाते है, जिन्होंने ऐसे लोगों से कई गुणा अच्छे काम किये होते है. यह सब हमारी अज्ञानता और ना-समझी से होता रहा है. उसे आज इस पढाई-लिखाई और विज्ञान के ज़माने में भी हम नहीं समझ पाते है, तो जिस तरह से इन्होंने हजारों वर्षों तक हमारे पूर्वजों को गुलाम बनाये रखा, उन्हें नागरिक अधिकारों से वंचित रखा, उसी प्रकार से आपको भी बनाये रखेंगे. इसलिए इस झाड-झंखाड़ को जितना जल्दी आप उतर फेकोगे, उतनी ही जल्दी आपकी उन्नति होगी.
                आज हमारा क्रमबद्ध इतिहास तो दूर की बात है, सामाजिक इतिहास भी लिखा हुआ नहीं है. विश्व-इतिहास की कुछ पुस्तकों में ‘मेग’ लोगों का जिक्र है, कुछ इतिहासकारों ने उनके राज-काज, कुछ ने उनके शिलालेखों, कुछ ने उनके सिक्कों आदि का कहीं-कहीं जिक्र किया है, परन्तु किसी की भी इस में रूचि नहीं होने के कारण वह बिखरी पड़ी सामग्री किसी काम की नहीं है. हालाँकि ये अवशेष बहुत पुराने है, परन्तु प्राचीन मेग जाति से सम्बंधित है, जिस नाम को आज भी आप धारण कर रहे हो, तो उसका संकलन और प्रकाशन भी आप में इतिहास का गौरव पैदा करेगा. उस से यह बात प्रमाणित हो जाती है कि सदा-सर्वदा आप लोगों की ऐसी दीन-हीन दशा नहीं रही है. इस जाति का भी राज रहा है और यह जाति इस देश की सबसे प्राचीन जाति है और वैदिक आर्यों के भारत आने से पहले ही यहाँ बस चुकी थी. हार और जीत होती रही है. दुनिया में कई जातियों का उत्थान हुआ और कईयों का पराभव हुआ है. पराभव को प्राप्त कईं जातियां इतिहास के बल पर वापस उठी भी है. आज का समय इस जाति के उठने का समय है, इसलिए दूसरे भोमिया, देवी-देवता, अवतार-आडम्बर को छोड़ कर आप अपने पर ध्यान दो और हर क्षेत्र में पारंगत बनाने की कोशिश करो.आप देखिये चालाक लोग अपने चरित्रों का साधारण लोगो में कैसे महिमा-मंडान करके आकर्षण पैदा करते है और उस आकर्षण में फंस कर हमारे लीग उनका गुण-गां करने लग जाते है, ऐसे तरीकों से वे अपना इतिहास आपके कन्धों पर डाल कर जिन्दा रखते है. इसलिए जितने भी ऐसे भोपे-भोमियां या देवी-देवता है, उनका गुणगान करना बंद कर दीजिये और जो आपके इतिहास के उज्जवल पक्ष है, उनको गाईये, उनका बखान करिए. उनके चंगुल से समाज को बाहर निकालिए.
                यह सही है कि सम्पूर्ण भारत का भी कोई क्रमबद्ध लिखित इतिहास नहीं मिलता है, परन्तु विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में ब्राह्मणों ने अपने इतिहास को उकेरा है, हम लोगों को उनकी गाथा-कथा में पीढ़ियों से बांधें रखा है, अब उस से छुटकारा पाने का समय आ गया है. उन में आपका कुछ नहीं है. आप अपने समाज की दुर्दशा पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि ये शास्त्र और उनकी कथा-किंवदंतियाँ ही आपके पतन और दुखों की जड़े है तो उनको दूर फेकने में ही आपकी भलाई है. अपने आत्म-सम्मान, आत्म-बल और विवेक पर विश्वास होना चाहिए और इसी में रूचि होनी चाहिए, अब भी पढ़े-लिखे लोगों की रूचि इस में जागृत नहीं हुई है, क्योंकि उन में पीढ़ियों से कोई इतिहास बोध ही नहीं रहा है. इस युग में भी जब आपको लिखने पढने की स्वतंत्रता है और आप इस ओर ध्यान नहीं देते है तो आप जीवंत समाज या जीवंत जाति में नहीं आ सकते है. देवी-देवताओं या भगवान-भोमियों की कथाएं करने, उनके चरित्र को याद करने या गाने से आपकी जाति उच्चमान पर नहीं आ सकती है. आपके द्वारा अपने ही चरित्रों के, अपने ही महापुरुषों के चरित्रों का गुण-गान करने, उन्हें याद रखने और संजो कर रखने से ही जाति का मान बढ़ता है और आपका इतिहास जिन्दा रहता है. इस बात को जिन-जिन जातियों ने समझा वे जातियां अपना गौरव स्थापित का सकी और जिसने इस ओर ध्यान नहीं दिया, वे इतिहास में अपना कोई स्थान नहीं बना पाई है. अतः आपको अपने नायकों , चरित्रों, समाज-सुधारकों आदि को सदैव जीवंत बनाये रखने वाले उपाय निरंतर जारी रखने चाहिए और दूसरों का गुण-गान करना बंद कीजिये, इसी में आपका भला है. 
                             अंत में, मैं यही कहना चाहता हूँ कि आप लोग उठिए, जागिये और मनोबल को प्राप्त करिए और अपना उद्धार अपने आप से करिए, किसी दूसरे के भरोसे नहीं रहें. आपने मुझे बुलाया और कुछ बातें कहने का मौका दिया, इसके लिए मैं आप सबका पुनः धन्यवाद करता हूँ और अपनी वाणी को विश्राम देता हूँ.
                                   जय भीम !  जय भारत !!