Tuesday, November 4, 2014

78. Hali and Meghs: हाली (हाळी) और मेघ

मेघवंश इतिहास और संस्कृति के भाग दो में मेघों की आर्थिक हालात के प्रसंग में "हाली" शब्द का प्रयोग भी हुआ है. हालाँकि वहां पर कई चीजें स्पष्ट की जा चुकी है, फिर भी जिन लोगों को इस शब्द की पृष्ठभूमि मालूम नहीं है, वे उसे किसी अन्य अर्थ में नहीं समझ ले इसलिए यहाँ पर कुछ आवश्यक टिपण्णी जरुरी है. संदर्भित शब्द किसी भी प्रकार से जाति द्योतक नहीं है, जैसा कि कुछ प्रदेशों में हाली शब्द एक जाति के अर्थ में प्रयुक्त होता है अर्थार्त मेघोन के प्रसंग में प्रयुक्त हाली शब्द जाति सम्बोधनार्थ हाली शब्द कान तो पर्यायवाची है और न समानार्थी .
15वीं-16वीं शताब्दि में इस शब्द के प्रयुक्त होने के साक्ष्य मिलते है. धारू मेघ के सन्दर्भ में 'हाली' शब्द का प्रयोग हुआ है और बाद मे भी यह शब्द राजस्व रिकार्डों में मिलता है. वस्तुत: 'हाली' शब्द 'हल' शब्द से निकला है. हल चलाने वाला 'हाली' कहा जाता है. मारवाड़ में हल चलाने को 'हल खड़ना' बोलते है. इस प्रकार 'हाळी' कृषि कार्यों में नियोजित व्यक्ति होता था . साधारणतया हाली की अपनी जमीन होती थी परन्तु गरीबी या ऋण की वजह से वे उसे ग़मा चुके होते थे और वे भूमि को अपने साधनों से जोत भी नहीं सकते थे. इस प्रकार से वे अन्य कृषकों केे आगे कृषि कार्य करने हेतु स्व प्रेरित हो जाते थे, जो उनसे कुछ बेहतर आर्थिक स्थिति में होते थे या कृषि साधनों से संपन्न होते थे. हल खड़ना उनका मुख्य नियोजन होता था . जिसकी न तो अपनी जमीन होती थी और न साधन (यथा बैल और बीज आदि), वह जमीन के मालिक के लिए हल चलाता था अर्थार्त उनके लिए खेती करता था और खेत की रखवाली भी करता था . उनके जानवरों गाय-बकरी आदि की देखभाल भी करता था . उनके लिए चारे-पानी की , मालिक के लिए इंधन लकड़ी आदि का प्रबंध भी करता था . अनाज आदि को खेत से घर या भण्डारण आदि की जगह लाने ले जाने आदि के कार्य भी करता था . उसका फसल या उपज में एक नियत हिस्सा होता था , जो स्थानीय परंपरा से तय हुआ होता था . सामान्यतया यह उपज का पांचवां हिस्सा होता था . अगर वह मालिक का कर्ज दार नहीं होता तो यह चौथा हिस्सा होता था .
अगर किसी को एक हाली की आवश्यकता होती तो जो इस कार्य हेतु इच्छुक होता उसको वह नियोजित कर लेता था . इस हेतु जो मेहनताना दिया जाता वह बहुत कम होता था . इस प्रकार वे अपनी जमीन भी गँवा बैठते और स्थायी सेवा हेतु बंध जाते. कृषि कार्यो हेतु यह रीती परंपरा और रुढ़ बनने के बाद कुरीति में बदल गयी और बेगारी व दासता की बड़ियों में तब्दील हो गयी .
प्राय: एस होता था कि अगर कोई किसी के वहां हाली बन जाता तो वह मालिक से अपने घर-परिवार के लिए य अन्य कार्यों हेतु और धन-राशि ले लेता चूँकि उसका श्रम मूल्य बहुत कम होता था अतः उसकी भरपाई विलंबित होती रहती थी . इसमे कई प्रकार की जटिलतायें थी , जिसे आप ठीक से समझ ले, वे सब जटिलतायें भी मेघों के पराभव का कारण बनी. मालिक उन्हें इस आशंका से की कहीं छोड़ के नहीं चला जाय , थोडा बहुत देता रहता था , कभी इधर कभी उधर --. इस प्रकार उनका आपस में चलता-फ़िरता हिसाब-किताब होता था.
हाली को छहमाही दार भी कहा जाता था, जो वर्षा आधारित कृषि कार्यों में छ: माह हेतु नियोजित होता था , पर धीरे धीरे यह छह माहीदार हाली कहलाने लग गये, विभिन्न कारणों से मेघों का अपनी जमीनों से ज्यादा विस्थापन हुआ , अत: ज्यादातर वे इस नियोजन में जीवन यापन करने हेतु बाध्य हुए . बाद में इजारेदारी आदि ने उनको पराधीनता में बांध दिया , जिसका जिक्र मेघवंश इतिहास और संस्कृति भाग दो में किया गया है.
इतना सब कुछ होने के बावजूद भी 'हाली' की यहाँ कोई अलग जातिगत पहचान नहीं बनी .इसके और भी कई कारन थे. मेघों के अलावा भी कई लोग हाली का जीवन यापन करते थे. कुछ लोगों ने इस जीवन यापन के तरीके को अपना कर आपनी अलग पहचान एक जाति के रूप में भी बना दी . ऐसे पहचान वाले समूह में 'भावल' शब्द ध्यान देने योग्य है . आज कहीं-कही पर इस नाम की जाती सुनने को मिलती है. वस्तुत: उस समय 'भावल' कृषि कार्यो में संलग्न ऐसे व्यक्ति को कहा जाता था जो कृषि कार्यों हेतु जमीन के मालिक के साथ मजदुर में साझेदारी करता था . इस में जमीन का मालिक अपनी जमीं और एक बैल जोतने के लिए देता था और भावल दूसरा बैल अपनी तरफ से खेत जोतने हेतु देता था , साथ में वह अपनी मेहनत लगता था . बीज और एनी सामान भी साझे दारी मे हुआ करते थे. जो भी शारीरिक श्रम होता ,वह भावल के हिस्से में ही आता था अर्थार्त पूरी मेहनत भावल को ही करनी होती थी. अगर जमीन का लगान जींस में देना होता तो जो फसल पैदा होती, उसे साझेदारी में बांटने से पहले लगान के रूप में अलग कर देते और फ़िर भावल और जमीन का मालिक उपज को बाँटते . अगर लगान नकद होता तो फसल को बराबर बाँट दी जाती और दोनों आधा-आधा लगान देते थे . एक प्रकार से यह एक सामान्य इकरार होता था. कभी कभी इकरार में और शर्ते भी जुड़ जाती थी.
इस प्रकार से भावल और हाली आदि शब्दों का प्रचलन हो गया और वे मान्यता प्राप्त बन गए . मेघ लोग इसे एतिहासिक रूप में कैसे लेते है, इसका कोई दस्तावेजी साक्ष्य अभी तक उजागर नहीं हुआ है परन्तु इस सम्बन्ध में प्राप्त अन्य सभी प्रमाण इससे मेघों के हुए आर्थिक पतन का ही वर्णन करते है, अत: मेघों ने इसका बाद में जमकर विरोध भी किया.
भावल समझोते के अनुसार यह कार्य छोड़ सकता था और हाली भी अपने मालिक की सेवा को तब छोड़ सकता था, जब उसका कोई लेन-देन बाकी न हो. अर्थार्त सामान्यतया हाली अपने मालिक की सेवा को तब तक नहीं छोड़ सकता था, जब तक कि उसकी उधारी या ऋण चुकता न हो जाय. अगर कोई दूसरा आदमी उस हाली को ले जाना चाहता तो उसे पहले वाले मालिक का ऋण चुकाना पड़ता था. ऐसा होने पर ही वह उस हाली को ले जा सकता था. अगर हाली खुद भी जाना चाहता तो भी उसे अपने मालिक का ऋण पहले चुकाना ही पड़ता था. नहीं चुकाने पर पीढ़ी दर पीढ़ी वे बंदगी या बेगारी में बन्ध जाते. अर्थार्त हाली की मृत्यु आदि की स्थितियों में उसकेपरिवार के सदस्यों को वो कर्जा चुकाना ही पड़ता था, ऐसी लोक मे मान्यता थी. अगर उसकी विधवा दूसरे व्यक्ति से विवाह कर लेती तो जो दूसरा आदमी उससे विवाह करता उसे पहले वाले का कर्जा चुकाना पड़ता . अर्थार्त उसे भी हाली बनना पड़ता . मान्यता यह थी कि कर्ज उसके परिवार के लिए ही काम में लिया गया था अत: चुकाना परिवार का फर्ज है आदि आदि.

बेगारी और धर्माराम जी मेघवाल

सन 1925 के आस-पास अकाल पड़ा, इससे काफी जन धन की हानि हुई. धर्माजी का परिवार जोधपुर आया, पर वहां से वर्षात के मौसम में खेती-बाडी हेतु गांवों में जाते रहते थे. गांवों में भयंकर अकाल के बाद वर्षा होने पर भी साधनों के आभाव में खेतों को जोतना दूभर होता था. जमीनों के मालिकाना हक की भी कोई खास व्यवस्था नहीं होती थी. लोग जहाँ-तहां खेती कर कर लेते थे और बस्तियां बसा लेते थे. पूर्व में धर्माजी का परिवार हापाँ गान्व में आ बसा था. यह गाँव कुछ राजपूत परिवारों और कुछ मेघवाल परिवारो के एक साथ वहां आने और वहां बसने के कारण ही आबाद हुआ था. पहले यहाँ कोई बस्ती नहीं थी . ये परिवार जैसलमेर - बाड़मेर सीमा पर बसे 'हापाँ की ढाणी' नामक बस्ती से घूमते हुए पीलवा के रास्ते यहाँ आकर बसे थे. अत इस नयी बस्ती का नाम भी उन्होंने हापाँ रख लिया था.
जमीने होने पर भी अकालों में मवेशी खो चुके परिवार साधन विहीन होने से खेती नहीं कर सकते थे. अत वे दूसरों के खेतों पर काम करने हेतु मजबूर होते थे. कई लोग साल-छ माही के लिए ऐसा करते थे तो कई लोग लम्बे समय तक इसमे लगे रहते थे. खेत जोतने वाला यानि हल चलाने वाला 'हाली (हाळी)' कहा जाता था. चाहे वह अपने लिए हल चलाये या दूसरे के लिये, उसके सम्बोधानार्थ 'हाळी' शब्द प्रयुक्त होता था. इस प्रकार से कृषि कार्यों में नियोजित व्यक्ति 'हाळी' कहा जाता था. साधारनतया हाली की अपनी जमीन होती थी. परन्तु गरीबी या अन्यान्य कारणों से वह या तो उसे खो चूका होता था या उसका उपभोग नहीं कर सकता था.
खेती-बाडी का काम लगभग छ महीने चलता था, अत ऐसे व्यक्ति को 'छमाहीदार' भी कहा जाता था. धीरे धीरे यह रीति उनके लिए बंधन का कारण बन गयी और ज्यादातर मेघवालों के परिवार इसमे पिसने लगे. उनका भयंकर शोषण होता था.इससे छुटकारा पाने के लिए मेघवालों ने कई जगहों पर सामूहिक विरोध किया. उसके फलस्वरूप भी उनका एक जगह से दूसरी जगह विस्थापन होता रहता था. जैसलमेर, जोधपुर व बाड़मेर इलको में सर्वाधिक हल चल थी, जिसमें धर्माजी के पिताजी मदाजी और उनके बहनोई उम्मेदा जी अग्रणीय थे.
इससे कैसे छुटकारा पायें , इस पर जगह जगह बहुत विचार विमर्श व पंचायते हुआ करती थी. जो लोग कर्जे से दबने के कारण जमीने खो चुके थे या हाली के नारकीय जीवन से छुटकारा नहीं पा सकते थे , उनके लिए मेघवालों की पंचायतें सामूहिक प्रयासों से आवश्यक धन बल की भी सहायता करती थी. धर्माजी नौकरी में आ चुके थे, अत मदाजी ऐसे कामों हेतु पंचायतों को उन्मुक्त रूप से धन भी उपलब्द्ध करवाते थे . उन्होने अपने कई रिश्ते दारों और अन्य मेघवाल परिवारों को इस बंधन से मुक्त करवाया .

कई बार उनको मुक्त करवाने में बहुत बड़ा झगडा फसाद हो जाया करता था. सेतरावा, हापाँ और केतु आदि गांवों में हुए संघर्ष में धर्माजी आगीवान रहे थे . हापों आदि में इस बेगारी उन्मूलन में उनके उल्लेखनीय योगदान पर अलग से लिखा गया है. यहाँ उनके सन्दर्भ में जो बात कहनी है वह सिर्फ इतनी है कि मेघवालों को हाली जैसे शोषण कारी चक्र के विरुद्ध लाम बद्ध करने और उसे एक मुकाम तक पहुँचाने मे धर्माजी की न केवल सक्रीय भूमिका थी, बल्कि एक प्रकार से उनका परिवार इस में आगिवान था.

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