Friday, February 17, 2017

165. Census 1961









164. As per Census-1961 - Sceduled Castes and Scheduled Tribes in the Ajmer District

As per Census-1961, following castes were enlisted as Sceduled Castes and Scheduled Tribes in the Ajmer District. For ready reference see the Rajasthan District Gazetteer Ajmer-1966 (Page 108 & 651)

Thursday, February 16, 2017

163. RAJASTHAN DISTRICT GAZETTEER- NAGAUR,

GAZETTEERS OF INDIA
RAJASTHAN DISTRICT GAZETTEER- NAGAUR,
GOVT OF RAJASTHAN, 1975, PAGE 75

Wednesday, February 15, 2017

162. In the area of Sirohi/Abu, Meghs were called Bhambis and Dhers.

Know your history from Gazetteers

In the area of Sirohi/Abu, Meghs were called Bhambis and Dhers.( see the GAZETTEER OF SIROHI AND MOUNT )

It has a running comment on it  in the Rajputana gazetteer volume-3, under the heading of 'village revenue officials.' It says as under:

"The principal village officials are the thanadar, the bhalownia and the banbi. The thanadars have charge of the police arrangements of the village. They are all Rajputs. In a few of the largest villages, such as Rohira, Pindwara, &c., there is a kind of naib thanadar called kanwaria. The bhalownias are all of the banya class, and are in Raj employ. Their duties correspond to those of patwaris in other districts. The banbis are Chamars or Dhers : they act as a sort of assistants to the thanadars, see to getting guides, coolies, supplies, &c., to travellers; run on messages, &c. Thanadars are paid wages at from five to fifteen rupees a month. The bhalownias are not paid regular wages in cash, but receive food and cleaning; and they and the thanadars both get shares of the produce in grain, varying according to circumstances. Banbis are generally paid a small sum annually in cash, and get shares of grain. The principal village servants are the carpenter, blacksmith, potter, currier and barber. Their remuneration also consists of a share of the grain from each house of the cultivating class, varying according to circumstances, which is given previous to the division of the produce." Page 120-121

Reference:
THE RAJPUTANA GAZETTEER.
VOLUME III.
SIMLA: GOVERNMENT CENTRAL BRANCH PRESS. 1880.

Monday, February 13, 2017

161. Meghwal in the census of Jaipur state-1911

know your history from the census reports.

MEGHWALs in the Census of Jaipur state-1911 are disdussed under the heading of 'Balais' on various pages of the census report..

 At page no. 237, appendix no.1 is given wherein brief notes on certain castes and sub-castes are given. After Description of Aggarwals and Ahirs, at page no.238 a brief note has been given on Balais, which says as under:

                    '' Balais "
''sub-castes:-
     1. MEGHWAL.
     2. KHANGAR.

'Both are separate endogamaous groups.'

'The Meghwals are more numerous than the other group.'
'They admit people of higher castes into their caste.'
'They have separate Panchayats.'

   After that a note is also given on 'CHAMARS' as under :

         'CHAMARRS'
'Sub-castes-
1. Raigars.
2. Chamars.'
 it is stated that 'They are separate endogamous groups. Formarly Chamars alone used to skin the dead carcasses of animals, but now the Raigars also do so.'
'Chamar marry the wife of the elder brother, but the Raigars abstain from doing so.'
'They have separate Panchayats'

reference
CENSUS OF JAIPUR STATE-1911, Page- 237



.

160. Social Status of Meghs in J&K

Know your history: Social status of Meghs in the state of Kashmir and Jammu in the past centuries
It remain as similar as prevailed in Marwar during that period. For Marwar, see Marwar Mardumshumari, 1891.

Here I am quoting word to word as written in Census of Kashmir in the year of  1901


      "19. None of the low castes, such as Meghs, Dooms, Chamars, etc., is allowed to enter the court-yard of a Hindu temple, nor any Hindu would liketo come in contact with them.

20. All the members of the castes named in the foregoing paragraph liveoutside the village, have their own wells and tanks to take water from, and haveto give warning of their approach to or keep out of the way of the high classHindus.

21. Amongst all the low castes, Meghs stand first; they do not touchDooms, Chamars, sweepers and Sansis. If they accidentally happen to do so,they wash themselves. Their caste principles are nearly the same as those ofother Hindus. They receive cash or dry substances from the above mentionedlow castes for performing their religious ceremonies ; and draw water with theirown vessels. But instead of the Brahmans the Meghs perform the dutiesconnected with the religious ceremonies of the low castes, while Gurus attendto all such rites amongst (he Bhikis or beggar class.)"  Page --78

Reference:
Census of India, vol-23,
census of Kashmir, 1901 report-1, page-78
The civil and military Gazette press, Lahore, 1902

In regard to land ownerships,
status of caste is shown as in descending order..at page 80

"Status in relation to the land.
(a) With regard to ownership—

1. Brahman. 5. Charak. 9. Langeh,
2. Thakkar. 6. Bahoo. 10. Baghal.
3. Manhas. 7. Jat. 11. Rakwal.
4. Rajputs. 8. Salehria. 12. Other castes.

(b) With regard to cultivation—
1. Brahman. 8. Charak. 15. Carpenters.
2. Jat. 9. Bahoo. 16. Meghs.
3. Kamboh. 10. Salebria. 17. Dooms.
4. Sanis. 11. Langeh. 18. Chamars.
5. Thakkar. 12. Baghal. 19. Bawarias.
6. Labana, 13. Rakwal. 20. Other castes."
7.Manhas  14. Blacksmith     Page- 80

Saturday, December 24, 2016

159. सम्मान और स्वाभिमान का जीवन - दिनांक 24 दिसंबर 2016 को जोधपुर में दिया गया उद्बोधन

मेघवाल :
सम्मान और स्वाभिमान का जीवन
(दिनांक 24 दिसंबर 2016 को जोधपुर में ‘मेघवाल समाज दर्पण-2016’ के विमोचन के अवसर पर दिया गया उद्बोधन)
-ताराराम
              
          भाईयो और बहिनों! आज हम सभी श्री प्रतापजी दहिया द्वारा सम्पादित ‘मेघवाल समाज दर्पण- 2016’ के विमोचन के अवसर पर यहाँ उपस्थित हुए है। इस दस्तावेज के प्रकाशन का यह चौथा संस्करण है, इससे पहले इस दस्तावेज के तीन संस्करण निकल चुके है। प्रत्येक संस्करण में प्रताप जी वर्त्तमान समाज के कर्ता-धर्ताओं की नवीन जानकारी से हमें अवगत करते है और हमारे समाज का दर्पण हमारे सामने रखते है। उनके इस सराहनीय प्रयास का हम सभी अभिनंदन करते है और उनको दिली-मुबारकवाद और साधुवाद देते है। राजस्थान के विशाल मेघवाल समाज में यह एक छोटा-सा प्रयास है, परन्तु दस्तावेज के रूप में यह एक बहुत बड़ा और सार्थक प्रयास है, जिसकी जितनी प्रशंसा की जाये, उतनी ही कम है।

                यह जो हमारा समाज है, वह सारे भारत में और भारत के बाहर भी फैला हुआ है, परन्तु राजस्थान में यह सर्वाधिक है।  संगठन की शक्ति के अभाव में इस जाति ने या यों कहे कि इस समाज ने  कई विपदाओं को भोगा है और भोगना पडा है या भोग रहा है, अगर ऐसा कहें तो यह कोई गलत बात नहीं होगी। संगठन से ही कोई समाज आगे बढ़ता है और अपनी एक पहचान बनाता है। संगठन नहीं होने से या इस में विघ्न आने से या उसकी कतिपय कमियों के कारण इस समाज की जो ऐतिहासिक पहचान रही है,  उसे वह भूल चुका है। हमें यह बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिए कि एक मजबूत संगठन समाज पर आने वाली विपत्तियों का कारगर उपाय होते है। एक संगठित समाज ही सम्मान और गरिमा को पा सकता है। बिखरा हुआ या अस्त-व्यस्त समाज या जाति कभी भी एक जाति या एक समाज के रूप में सम्मान और गौरव को नहीं पा सकता है। ऐसे अवसरों पर हमें उस पर चर्चा करनी चाहिए और हमारे समाज के बारे में हमारी जो समझ है, उसे आने वाली पीढ़ी को सौंपना चाहिए। किसी भी जीवंत समाज के लिए यह आवश्यक है। जो समाज ऐसा नहीं कर पाता है,  वह धीरे-धीरे काल के गहरे खड्डे में गिर जाता है और उसकी बुरी गति होती है। अपने गुणों का, अपनी धरोहर का संग्रहण करना और उसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरण करने का गुण केवल मनुष्य जाति के पास है। पढने-लिखने की कला ने उस गुण में चार चाँद लगा दिए है। जिस के पास यह कला होती है, वह समाज उसे लिखकर सुगम रूप से अपनी आगे आने वाली पीढ़ी को सौंपने में कामयाब होता है। वह अपने इतिहास को, अपने ज्ञान को, अपने रीति-रिवाजों को, अपनी संस्कृति आदि को ऐसे माध्यमों से भविष्य के लिए सुरक्षित करता है। आज हमारा जो समाज है, उसके पास ऐसी धरोहर का नितांत अभाव है, परन्तु बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के पुण्य-प्रताप से हमारे पास पढ़ने-लिखने की कला आई है और वह गुण भी है। इसलिए, जो भूले-बिसरे तार है, जो कुछ इधर-उधर बिखरी सामग्री है, उसे समेकित कर हम अपने इतिहास का संधान कर सकते है, अपनी संस्कृति की पहचान कर सकते है और उस इतिहास पर गौरव अनुभव कर सकते है। आज का यह जो कार्यक्रम है और जिस पत्रिका का विमोचन किया जा रहा है, वह इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस जाति के जोधपुर और उसके आस-पास के अधिकांशतः नौकरीपेशा लोगों की व्यक्तिगत जानकारी इस दर्पण में संकलित है। विभिन्न व्यवसायों में संलग्न और विभिन्न जगहों में कार्यरत लोगों की जानकारी एक जगह पर उपलब्द्ध करवाकर संपादक ने न केवल बिखरे लोगों को एक होने का सन्देश दिया है, बल्कि उनके स्वाभिमान और सम्मान को भी बढाया है। मैं आशा कर सकता हूँ कि इस में सम-सामयिक लोगों के बारे में कुछ लिखित सामग्री है, वह आप में अपने इतिहास में रूचि जाग्रत करने, उसे खोजने, उसे लिपिबद्ध करने की प्रेरणा भी प्रदान करेगी।

         सम-सामयिक पत्र-पत्रिकाएं, स्मारिकाएं आदि अपने समय के दस्तावेज होते है और उन में अंतर्विष्ट सामग्री उस समय के इतिहास की झलक प्रस्तुत करते है। वे इतिहास के स्रोत होते है। इतिहास से समाज को एक दृष्टि और गौरव भी मिलता है। जिनका इतिहास नहीं होता, उनका अस्तित्व मिट जाता है। सारी दुनिया में और उन्नतिशील जातियों में इतिहास का बड़ा गौरव माना जाता है, इसलिए वे सम-सामायिक घटनाओं और व्यक्तियों का दस्तावेजीकरण करते है और उसे विभिन्न तरीकों से संभाल कर रखते है। आने वाली पीढ़ी उसे दुनिया के सामने रखकर अपना नाम और गौरव स्थापित करती है। राजस्थान में प्राचीन समय से एक कहावत प्रचलित है कि “नाम गीतों या भीतों से ही रहता है।” कहने का तात्पर्य यह है कि जिनका इतिहास या चरित्र ऐतिहासिक पुस्तकों में लिखा रहता, जिनका बखान गानों, कथा-किंवदंतियों में किया जाता है या जिनके बनवाये महल-मालिये, मकानात आदि विद्यमान होते है, उन्हीं की कीर्ति चिर-स्थायी रहती है। आज हम महान सम्राट अशोक, हर्षवर्धन और जिन राव या महारावों का जिक्र करते है, उनका पुस्तकों या शिलालेखों आदि में जिक्र होने के कारण ही उनको जानते है और ऐसे शख्सियत या चरित्र जिन लोगों से सम्बंधित होते है, उनको गौरव मिलता है, वे उन पर गौरव करते है। आप देखेंगे कि वे लोग, जो अपने आपको तथाकथित मुख्य-धारा का कहते है,  वे अपनी जाति-बिरादरी के किसी भी आदमी ने कुछ भी थोडा-बहुत पुण्य-प्रताप या अच्छा-भला किया है, तो उसका बड़ा बखान करेंगे और उसको बढा-चढा कर चावा करेंगे। उसे कहानियों और गीतों में फैलाकर लोगों को उस ओर आकर्षित करेंगे और काफी समय तक ऐसा करने के बाद ऐसे साधारण लोगों को फिर ये अलौकिकता का आवरण चढ़ा कर देवी-देवता के रूप में महिमा-मंडित कर देते है और भोले-भाले लोग उनके जाल में फंस जाते है। ऐसे तरीकों और आकर्षण से भी वे अपने इतिहास को जिन्दा बनाये रखते है और हम अपने ही उन लोगों को भूल जाते है, जिन्होंने ऐसे लोगों से कई गुणा अच्छे काम किये होते है। यह सब हमारी अज्ञानता और ना-समझी से होता रहा है। उसे आज इस पढाई-लिखाई और विज्ञान के ज़माने में भी हम नहीं समझ पाते है, तो जिस तरह से इन्होंने हजारों वर्षों तक हमारे पूर्वजों को गुलाम बनाये रखा, उन्हें नागरिक अधिकारों से वंचित रखा, उसी प्रकार से आपको भी बनाये रखेंगे। इसलिए इस झाड-झंखाड़ को जितना जल्दी आप उतर फेंकोगे, उतनी ही जल्दी आपकी उन्नति होगी और साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और स्मारिकाओं के माध्यम से अपने लोगों के संघर्ष और स्वाभिमान की जीवनियों और दृष्टान्तों को निरंतर आगे लाते रहेंगे तो आपके गौरव को कोई खंडित नहीं कर सकेगा, ऐसी आशा की जा सकती है।

                आज हमारा क्रमबद्ध इतिहास तो दूर की बात है, सामाजिक इतिहास भी लिखा हुआ नहीं है। विश्व-इतिहास की कुछ पुस्तकों में ‘मेग’ लोगों का जिक्र है, कुछ इतिहासकारों ने उनके राज-काज का, कुछ ने उनके शिलालेखोंका, कुछ ने उनके सिक्कों आदि का कहीं-कहीं जिक्र किया है, परन्तु किसी की भी इस में रूचि नहीं होने के कारण वह बिखरी पड़ी सामग्री किसी काम की नहीं है। हालाँकि; ये अवशेष बहुत पुराने है, परन्तु प्राचीन ‘मेग’ जाति से सम्बंधित है, जिस नाम को आज भी आप धारण कर रहे हो, तो उसका संकलन और प्रकाशन भी आप में इतिहास का गौरव पैदा करेगा। उस से यह बात प्रमाणित हो जाती है कि सदा-सर्वदा आप लोगों की ऐसी दीन-हीन दशा नहीं रही है। इस जाति का भी राज रहा है और यह जाति इस देश की सबसे प्राचीन जाति है और वैदिक आर्यों के भारत में आने से पहले ही यह कौम यहाँ बस चुकी थी। हार और जीत होती रही है। दुनिया में कई जातियों का उत्थान हुआ और कईयों का पराभव हुआ है। पराभव को प्राप्त कईं जातियां इतिहास के बल पर वापस उठी भी है। परन्तु जिनका इतिहास नहीं होता है या जो अपने इतिहास को भूल जाते है, वे अंधकार के गहरे कूप में डूब जाते है। ऐसी कौम का सम्मान और स्वाभिमान खंड-विखंडित हो जाता है। आज का समय इस जाति के उठने का समय है, इसलिए दूसरे भोमिया, देवी-देवता, अवतार-आडम्बर को छोड़ कर आप अपने पर ध्यान दो और हर क्षेत्र में पारंगत बनने की कोशिश करो और एक नए इतिहास को रचने की काबिलियत पैदा करो। आप देखिये, चालाक लोग अपने चरित्रों का साधारण लोगो में कैसे महिमा-मंडन करके आकर्षण पैदा करते है और उस आकर्षण में फंस कर हमारे लोग उनका गुण-गान करने लग जाते है, ऐसे तरीकों से वे अपना इतिहास आपके कन्धों पर डाल कर जिन्दा रखते है। इसलिए जितने भी ऐसे भोपे-भोमियां या देवी-देवता है, उनका गुणगान करना बंद कर दीजिये और जो आपके इतिहास के उज्जवल पक्ष है, उनको गाईये, उनका बखान करिए, उनको लिखिए, उनको दस्तावेज का रूप दीजिये। दूसरे लोगों की कथा-किंवदंतियों से, उनके चंगुल से समाज को बाहर निकालने के लिए ऐसी स्मारिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

                मैं मेघवालों के सम्मान और स्वाभिमान के जीवन के बारे में कुछ ऐतिहासिक तथ्य रखूं, उससे पहले यह बता देना चाहता हूँ कि सम्पूर्ण भारत का भी यदि कोई क्रमबद्ध लिखित इतिहास नहीं मिलता है, तो मेघों के इतिहास में भी क्रमबद्धता की आशा नहीं की जा सकती है। ऐसी कल्पना करना भी योग्य नहीं ठहरता है। परन्तु आप देखते है कि विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में ब्राह्मणों ने अपने इतिहास को उकेरा है, हम लोगों को उनकी गाथा-कथा में पीढ़ियों से बांधें रखा है, अब उस से छुटकारा पाने का समय आ गया है। उन में आपका या यों कहें कि हमारा कुछ नहीं है तो कोई गलत बात नहीं होगी। आप अपने समाज की दुर्दशा पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि ये शास्त्र और उनकी कथा-किंवदंतियाँ ही आपके पतन और दुखों की जड़े है तो उनको दूर फेंकने में ही आपकी भलाई है। अपने सम्मान, अपने मनोबल और विवेक पर विश्वास होना चाहिए और इसी में रूचि होनी चाहिए। विज्ञान और तकनिकी के इस युग में, जबकि सूचनाएं आपके एक बटन दबाते ही उपलब्द्ध होती है, फिर भी अगर पढ़े-लिखे लोगों की रूचि इस में जागृत नहीं हुई है तो यह जितना विषाद का विषय नहीं है, उससे ज्यादा चिंतन का विषय है, क्योंकि उन में पीढ़ियों से कोई इतिहास बोध ही नहीं रहा है। इस युग में भी जब आपको लिखने पढने की स्वतंत्रता है और आप इस ओर ध्यान नहीं देते है तो आप जीवंत समाज या जीवंत जाति में नहीं आ सकते है। देवी-देवताओं या भगवान-भोमियों की कथाएं करने, उनके चरित्र को याद करने या उनको गाने से आपकी जाति उच्चमान पर नहीं आ सकती है। आपके द्वारा अपने ही चरित्रों के, अपने ही महापुरुषों के चरित्रों का गुण-गान करने, उन्हें याद रखने और संजो कर रखने से ही किसी भी कौम का मान बढ़ता है और उसका इतिहास जिन्दा रहता है। इस बात को जिन-जिन जातियों ने समझा है, वे जातियां अपना गौरव स्थापित कर सकी और जिसने इस ओर ध्यान नहीं दिया, वे इतिहास में अपना कोई स्थान नहीं बना पाई है। अतः आपको अपने नायकों, चरित्रों, समाज-सुधारकों आदि को सदैव जीवंत बनाये रखने वाले उपाय निरंतर जारी रखने चाहिए और दूसरों का गुण-गान करना बंद कर देना चाहिए, इसी में आपका भला है। इसी में आपका सम्मान और स्वाभिमान है।

              मैं यहाँ पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में मेघवाल जाति के स्वाभिमान और सम्मान से जुड़े दो महत्वपूर्ण मुद्दों को आपके सामने जानकारी हेतु रखना चाहूँगा, जिसने मेघवाल समाज को नई दिशा और नया जीवन दिया। पहला रहन-सहन, खान-पान और आर्य-समाज से जुड़ा मुद्दा है और दूसरा वेठ-बेगारी या शोषण मुक्ति से जुड़ा मुद्दा है। ये इस समाज के लम्बे और निरंतर संघर्ष के कुछ उदाहरण मात्र है, ऐसे अनेक प्रयत्न विगत काल में होते रहे है, जिनका लेखा-जोखा आज हमारे सामने नहीं है, परन्तु ये दोनों ऐतिहासिक प्रयत्न सद्य पिछली शताब्दी में हुए है और इनका प्रभाव हमारी और निवृतमान पीढ़ी की स्मृतियों में अभी भी शेष है, अतः उसको उदहारण के रूप में रख रहा हूँ। मैं इस अवसर पर यह कहना चाहता हूँ कि यहाँ निवास करने वाली मेघवाल जाति के सम्मान और स्वाभिमान से जुड़ी इन दोनों ऐतिहासिक घटनाओं का मेघवाल जाति पर गहरा असर पड़ा। इन घटनाओं का सीधा सन्देश यही है कि मेघवाल जाति का ध्येय वाक्य ‘लाभापेक्षा इज्जत प्यारी’ रहा है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में उनके द्वारा जगह-जगह पर किये गए छोटे-बड़े संघर्ष इस बात की पुष्टि करते है।         

     आर्य समाज की गतिविधियाँ और मेघवाल -   

                  यह सभी जानते है कि आर्य समाज की स्थापना दयानंद सरस्वती ने की थी। यह विशुद्ध रूप से हिन्दू धर्म के एक सुधारवादी आंदोलन के रूप में सारे भारत में जाना गया और इसका प्रभाव भी पड़ा। यह मात्र प्रचारक रूप ही नहीं था बल्कि सामाजिक रूढ़ीवादिता पर प्रहार भी था। कुल-मिलाकर इसे एक राष्ट्रवादी नजरिये से देखा गया और जो हिन्दू वर्ण व्यवस्था में नहीं थे या जो उसे नापसंद करते थे या जिन्हें दूसरे धर्म और पंथ पसंद थे, ऐसे अनेकानेक लोगों को घेरकर वापस हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था में उन्हें समाज में एक स्तर प्रदान करने की गवेषणा से लबरेज यह एक जातीय या राष्ट्रवादी आंदोलन था। इसका मंतव्य बढ़ते हुए ईसाई धर्म और मुसलमान धर्म को रोकना भी था। भारतीय समाज पर इसका गहरा प्रभाव भी पड़ा, इसे नकारा नहीं जा सकता एवं भारत के विभिन्न भागों में निवासित मेघ समाज भी आर्य-समाज की इन गतिविधियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका।

पिछली शताब्दियों में मेघवालों द्वारा अपने सम्मान और स्वाभिमान के लिए किये गए आन्दोलनों पर दृष्टिपात करने से हमें ज्ञात होता है कि सिंध-पंजाब में आर्य-समाज की स्थापना होने से पहले ही मेघों ने अपनी जाति के सम्मान के लिए वृहत्तर हिन्दू समाज की धारा में शामिल होने के लिए धार्मिक और सामाजिक स्तर पर विभिन्न तरह के प्रयत्न शुरू कर दिए थे। समाज के सम्मान और गरिमा को लेकर अथवा मेघवाल जाति की आण-बान को लेकर उनके इन प्रयत्नों का लेखा-जोखा अभी तक इतिहासकारों की नजर से ओझल है। पढ़े-लिखे लोगों का दायित्व है कि वे इन ऐतिहासिक प्रयत्नों को दुनिया के सामने उजागर करे। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत होते-होते जमीनों के हक़-हुकुक और समाज में मेघवाल जाति के साथ सम्मान और  बराबरी के  हक़ की प्राप्ति के लिए छोटे-बड़े आंदोलन जगह-जगह होने लगे। आर्य-समाज ने भी शुद्धि का आंदोलन शुरू कर मेघों की इस जागृति को बल दिया। मेघवाल समाज सिंध से लेकर मारवाड़ तक सघन रूप से फैला हुआ था और अकाल की विभीषिकाओं और बैठ-बेगारी से त्रस्त था। इस अवधि में मेघवाल जाति पर आर्य-समाज की विचार-धारा का पूरा प्रभाव पड़ा।

हमें यह जानकारी मिलती है कि दयानंद सरस्वती स्वयं राजस्थान में कई बार आये थे। सन 1865 में वे करौली आये थे। जहाँ से किशनगढ़, जयपुर, पुष्कर, अजमेर आदि जगहों पर गए और वहां उपदेश दिए। इसके बाद वे 1881 में भरतपुर आये और वहां से जयपुर, अजमेर, ब्यावर, मसुदा, बनेड़ा, चितौडगढ़ और उदयपुर आदि जगहों पर गए और आर्य-समाज का प्रचार किया, जिसका प्रभाव राजा-रईसों के साथ-साथ मेघवालों सहित साधारण जनता पर भी पड़ा। उस समय सज्जनसिंह उदयपुर का महाराणा था। अगले वर्ष अर्थात 1882 में वे पुनः उदयपुर आये और सत्यार्थ-प्रकाश की भूमिका वहीँ लिखी। उस समय उदयपुर में आर्य समाज की स्थापना की गयी। इस समाज निर्माण में विभिन्न सवर्ण हिन्दू जातियों के साथ-साथ कई मेघवाल, चमार, मोची आदि हिन्दू-बाह्य जातियां भी जुडी। वहां पर जोधपुर के महाराजा जसवन्त सिंह ने उन्हें जोधपुर आने का निमंत्रण दिया। अस्तु, वे जोधपुर भी आये। करीब महिना भर उन्होंने मारवाड़ के विभिन्न जगहों में प्रवास किया था। जिनमें किशनगढ़, अजमेर, ब्यावर, जोधपुर, पाली आदि प्रमुख है। यह विदित है कि शाहपुरा, मसुदा, खेतड़ी, उदयपुर आदि के राजा और रईस आदि उनके शिष्य थे। उदयपुर में 1882 के प्रवास के बाद 1883 में जब दयानंद सरस्वती जोधपुर आये तो उन्होंने महाराजा जसवंतसिंह, सर प्रतापसिंह और रावराजा तेजसिंह आदि को उपदेश दिए, जिसका प्रभाव सभा-सदों के साथ-साथ साधारण जनता पर भी हुआ और जोधपुर में भी कई जातियों के लोग आर्य समाजी बने। जोधपुर प्रवास के समय दयानंद सरस्वती के साथ घात हुआ, उन्हें अजमेर ले जाया गया और 30 ओक्टोम्बेर को अजमेर में उनका देहावसान हुआ। दयानन्द सरस्वती के देहावसान के बाद भी आर्य-प्रचारकों का जोधपुर में आना-जाना लगा रहा और विभिन्न अवसरों पर राजा-रईसों और साधारण जनता को आर्य बनने और बनाने की सीख देते रहे। दयानंद सरस्वती के बाद आर्य समाज का पूरा जोर शुद्धि पर आ टिका था। 

रहन-सहन, खान-पान, यज्ञ-हवन या संस्कार की नई-नई विधियों का प्रचलन हिन्दू लोगों में होने लगा और आर्य समाज में समाहित होने वाले नए-नए लोगों या जातियों की पवित्रता या शुद्धता उसी पैमाने से आंकी जाने लगी थी। खान-पान में हिन्दू लोगों में मांस-भक्षण कोई अपवित्र नहीं माना जाता था, परन्तु बाद में आर्य-समाज के निरामिष भोजन के जोर ने इसे पवित्रता या शुद्धि से जोड़ दिया था। पंजाब में मांस भक्षण का बहुत चलन था, अतः जब पंजाब में आर्य-समाज की स्थापना हुई और उसकी गतिविधियां शुरू हुई तो पहले–पहल आर्य–समाज ने इस पर ध्यान नहीं दिया और आर्य-समाज ने अहिंसा-धर्म पालन की ओर भी कोई रूचि नहीं दिखाई। आर्य-समाज शुरू-शुरू में मूर्ति-पूजा और मृतक-श्राद्ध के खंडन में ही अग्रणी थे, जो मेघवालों में पहले से ही प्रचलन में नहीं थे और सन 1891 की राय-शुमारी के अनुसार मेघवाल जाति शराब से भी कोसों दूर थी, उसके हाथ भी नहीं लगाती थी। अतः मेघवालों के लिए आर्य-समाजी बनना या बनाना कठिन नहीं था। परन्तु उस समय पंजाब में शराब और मांस-भक्षण आर्य-समाजियों में ज्यों के त्यों चलते रहे। आर्य-समाज के प्रारम्भिक इतिहास से ज्ञात होता है कि वे अग्निहोत्र के अभ्यास और मद्य-मांस के वैराम्य को आवश्यक नहीं मानते थे। लेकिन पेशावर में सन 1882 को आर्य-समाज का प्रधान बनाये जाने के समय  मांस-भक्षण का मुद्दा भी उठा। पंजाब के लाहौर-पेशावर और सिंध के अन्य हिस्सों में मांस-भक्षण करने और न करने को लेकर झगड़े-फसाद भी होने लग गए। संभवतः वहीँ से इस पर आगे जाकर आर्य-समाज के विचारकों के दो धड़े बन गए। आर्य मुसाफिर लेख्रराम मांस-भक्षण के पूर्णतः खिलाफ थे। सन 1889 को लेखराम अजमेर आये और उनके व्याख्यान अजमेर, नसीराबाद आदि जगहों पर हुए। दूसरी बार जून, 1892 में अजमेर आये और राजपूताने के रईसों, ठाकुरों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों से मिले। पंडित लेखराम पुनः 25-26 मार्च 1893 को जयपुर के आर्य-समाज के वार्षिक उत्सव में आये और जन-प्रिय व्याख्यान दिए। इन दिनों समाज में मांसाहारी खाने को लेकर सब तरफ हल-चल देखने को मिलती है, यहाँ का मेघवाल समाज भी इससे अछूता नहीं रह सका अर्थात उनकी पंचायतों में भी इसके पक्ष व विपक्ष में जाति के सम्मान और गरिमा के लिहाज से खुलकर चर्चा होने लगी। इस अवधि में मेघवालों की पंचायतों का यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा होता था। सन 1879 में मेघ जाति ने गंदे या नीच कहे जाने वाले धंधे छोड़ने और मरे हुए जानवरों का मांस नहीं खाने का सार्वजनिक आह्वान किया था। अगर इस समाज का कोई आदमी ऐसा कृत्य करते हुए पाया जाता तो उसे दंड का भागीदार बनाया जाता था और मेघवाल जाति से बाहर कर दिया जाता था। मेघवाल जाति इसे अपने सम्मान और स्वाभिमान से जोड़कर आगे बढ़ी थी, लेकिन उसके बाद अकाल की विभीषिकाओं से इस समाज में इस संकल्प को निभाने में शिथिलता आ गयी। कहीं-कहीं रहन-सहन और खान-पान की शिथिलता साधु-संतों और समाज-सुधारको के लिए चिंता का विषय होता था और वे लोग निरंतर इस हेतु समाज में जाग्रति फ़ैलाने और हर संभव मदद करने को तैयार रहते थे। इन में सबसे बड़ी भूमिका मेघवालों की पंचायतों की थी। मेघवालों के स्वाभिमान, सम्मान तथा गरिमा को जितना ज्यादा महत्त्व और जितनी दृढ़ता इनकी पंचायतो ने दी, उतनी किसी अन्य ने नहीं दी।                      

लाहौर के आर्य समाज में मांस-भक्षण विषयक जो झगडा चला था, उसको बहुत-कुछ पुष्टि जोधपुर से मिली थी। इसी प्रसंग में सन 1893 के अगस्त महीने में पंडित लेखराम जोधपुर आये। उस समय जोधपुर राज के प्रमुख महाराज मेजर जनरल प्रतापसिंह थे। उनके पिता के समय स्वामी दयानद सरस्वती जोधपुर आये थे और उनके व्याख्यान महाराज प्रताप सिंह ने सुन रखे थे। आर्य-समाज के स्रोतानुसार महाराज प्रताप सिंह थे तो ऋषि दयानन्द और वैदिक-धर्म के दृढ भक्त; परन्तु उनके मन में यह बात बैठ गयी थी कि मांस-भक्षण के बिना राजपुत जाति की वीरता स्थिर नहीं रह सकती। अतः उन्होंने यह लीला रची कि समाचार पत्रों के संपादकों तथा धर्मोपदेशकों से मांस भक्षण के समर्थन में व्यवस्था दिलाई जाये। इसी कार्य हेतु आर्य-गजट और भारत-सुधार सभा नाम के नामी समाचार पत्रों के संपादकों को पारितोषिक मिला। कुछ प्रसिद्द आर्य-पुरुषों को भी महाराजा प्रताप सिंह की हाँ में हाँ मिलाने के लिए धन मिला। कई जातियों में इस पर चर्चा होना वाजिब था और जोधपुर में इस अवधि में कई जातीय संगठन भी बनने लगे। जोधपुर परगने में “मेघवंशी समाज सुधार सभा” की उपज भी इसी पृष्ठभूमि में हुई। महाराज प्रताप सिंह ने पत्र-पत्रिकाओ और जन-मत को अपने पक्ष में करने के उपरांत आर्य समाज के दिग्गज पंडितों को भी इस विषय पर विमर्श के लिए निमंत्रण भेजा। दयानंद के निज-शिष्य रहे पंडित भीमसेन और मेरठ के पंडित गंगाप्रसाद को निमंत्रण भेजा गया। ये दोनों 2 अगस्त 1892 को प्रातः जोधपुर पहुंचे।

पंडित गंगाप्रसाद ने मांस-भक्षण का समर्थन नहीं किया परन्तु पंडित भीमसेन ने इस मुद्दे को गोल-माल कर दिया। उसने यह भी कहा कि वेद में मांस-भक्षण का प्रत्यक्ष खंडन है, परन्तु यह मानकर कि हिंसक पशुओं का वध पाप नहीं है, उसने ऐसे पशुओं के मांस-भक्षण का विधान कर दिया। ऐसा प्रचार भी हो गया। पंडित लेखराम 5 अगस्त को जोधपुर पहुँचा और पंडित भीमसेन की हालत पतली कर दी। दूसरे दिन पंडित भीमसेन ने महाराजा प्रतापसिंह को जाकर कुछ यों संशोधित निवेदन किया- “मांस-भक्षण पाप है और वेदों में हानिकारक पशुओं को दंड देने और आर्थिक हानि पहुंचाए तो मार डालने की आज्ञा है, परन्तु मांस उनका भी अभक्ष्य ही है। और मैंने जो कहा था कि उनके खाने में अधिक दोष नहीं है, ( सो ) उसका यह आशय नहीं लिया जा सकता कि हानिकारक पशुओं का मांस खाना चाहिए, वा उससे कोई दोष नहीं है। मेरा तात्पर्य यह था कि ऐसे पशुओं के मारने में संसार की कुछ हानि नहीं है और उपकारी पशुओं के मांस खाने की अपेक्षा कम दोष है, परन्तु दोष अवश्य है। इसलिए हानिकारक पशुओं का भी मांस नहीं खाना चाहिए, वह भी सर्वथा अभक्ष्य है।“                                                                 

 सन 1899-1900 में मारवाड़ में भयंकर अकाल पड़ा, तब पंजाब के आर्य-समाज के दीवान चंद चड्ढा जोधपुर आये और आर्य-समाज की ओर से राहत-शिविर आदि लगाये गए थे। यह सब बताने का तात्पर्य यह है कि मारवाड़ में भी हमारे समाज के लोग न केवल आर्य-समाज की गतिविधियों से परिचित थे, बल्कि कई लोग उस समय आर्य-समाजी भी बने। मेघों को हर-एक वो आंदोलन, जो मेघों की तकलीफ़ों को कम करने में मदद करने वाला लगता, उनको लुभाता था। इसलिए 20वीं शताब्दि के प्रारंभ से ही मेघ लोग ऐसे आंदोलनों से जुड़ते गए। सन् 1901-1902 के दरम्यान मुल्तान और उसके आस-पास के क्षेत्रों में 30000(तीस हजार) मेघों ने आर्य-समाज के शुद्धिकरण से आर्य धर्म अपनाया। सन् 1911 में मीरपुर में 1047 लोग आर्य समाजी बने थे, और कई अन्य जगहों पर भी भारी तादाद में मेघ लोगों का रुझान आर्य समाज की ओर हुआ और वे आर्य समाजी बने। मेघों के शुद्धिकरण की ऐसी प्रमुख-प्रमुख घटनाओं का विवरण मैंने अन्यत्र किया है। यहाँ यह सब बताने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि उस समय मेघवालों में मांस खाने या ना खाने की जो सामाजिक जद्दो-जेहद देखने को मिलती है, वह इसी पृष्ठभूमि की उपज है। विक्रमी संवत 1956 और विक्रमी संवत 1996 के भयंकर अकालों और महामारी में लोगों ने पेड़ों की छाल, केर और जाल और घास को खाकर जीवन निर्वाह किया तो कई लोग मरी में मांसाहार से विमुक्त भी नहीं रह सके। इस अवधि में, जबकि खेती-बाड़ी और लाग-बेगार का कोई अवसर नहीं बचा था, जीविका-उपार्जन के लिए मेघवाल लोग विभिन्न तरह के व्यवसायों में भी संलग्न हो गए।                  

इन विपन्न और आपद-जन्य परिस्थितियों में भी उस समय रहन-सहन, खान-पान और रीति-रिवाज, शील-संस्कार आदि सब मेघवालों की पंचायतों के वैचारिक और व्यवहारिक मुद्दे थे। अशुद्धता या अपवित्रता को दूर करने के लिए शुद्धि-मन्त्र, शुद्धि-क्रिया, होम और हरिद्वार-स्नान आदि उस समय प्रचलन में आने लगे। ये सब वे अपनी जाति के सम्मान और स्वाभिमान के नजरिये से देखकर ही करते या नहीं करते थे। सन 1903 की 14 मार्च को स्यालकोट की ‘मेघ उद्धार सभा’ ने आर्य समाज के मातहत मेघ समाज में सुधार कार्यों को गति दी। सारे भारत में आर्य-समाज ने इसे एक जबरदस्त आन्दोलन के रूप में चारों ओर फ़ैलाया। उस समय आर्य-समाज की ‘भारत शुद्धि सभा’ के नाम से भी संस्था कार्यरत थी, जो हिन्दू-बाह्य जातियों को शुद्धिकरण के द्वारा आर्य बनाकर हिन्दू धर्म से जोड़ रही थी। सन 1911 में गुरुकुल उत्सव के समय कांगड़ी में भारत शुद्धि सभा में तय किया गया कि विभिन्न जगहों में शुद्धिकरण आन्दोलन को अंजाम देने वाले नेताओं में आपसी समन्वय के लिए एक मंच प्रदान किया, अस्तु: अखिल भारतीय शुद्धिकरण सभा का गठन किया गया। सन 1911 में ही हिन्दू कांफ्रेंस के बाद इलाहबाद में ‘अखिल भारतीय शुद्धि सभा’ की एक कांफ्रेंस हुई और इस संस्था का रजिस्ट्रेशन 23 जून 1911 को कराया गया। इस कांफ्रेंस में प्रायश्चित और होम के द्वारा गैर-वैदिक हिन्दुओं को आर्य बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया और जमीनी स्तर पर जोर-शोर से कार्य शुरू किया गया। इसने शुद्धि के कार्यक्रम में नई स्फूर्ति और जान डाल दी। इसका सबसे सफल कार्य स्यालकोट के ‘मेघ समाज उद्धार सभा’ का रहा।

 ‘मेघ सुधार सभा’ ने शुद्धिकृत मेघों के लिए क्लारकबाद  ( clarkbad ) में मेघों के लिए एक अलग बस्ती बसाई, मेघों ने वहां कुआँ खोदा, आर्य-समाज की मदद से मेघों के लिए मकान बनाये गए, अस्पताल बनाया गया और शिक्षा का प्रबंध भी किया गया। आर्य समाज ने ऐसे शुद्धिकृत मेघों के समाज को नए ढंग से पुनः गठित करने का भी बीड़ा उठाया और उनकी एक सभा बनायीं, जिसे ‘चौधरी सभा’ के नाम से पुकारा जाने लगा। मेघों की यह चौधरी सभा बहुत कुछ उनके पुराने पंचायतों की तर्ज पर ही थी, बस फर्क यह था कि प्रायश्चित और हरिद्वार या होम उसमें जुड़ गए थे और आर्य समाज ने जो संस्कार ज्ञापित किये थे, लोग उनकी ओर उन्मुख होने लगे, जो इस आर्य-भगतों ( मेघों को आर्य समाज द्वारा दिया गया नाम ) की ‘चौधरी सभा’ की देख-रेख में होते थे। ऐसा नहीं है कि आर्य-समाज की ये गतिविधियां निरापद रूप से चलती रही हो, कई बार उनका और सनातनी हिन्दुओं, सिखों और मुसलमानों आदि से झगडा-फसाद और मार-पीट होती रहती थी। मारवाड़ में सवर्ण जातियों और मेघवालों के बीच इसको लेकर कुत्ते-बिल्ली की स्थितियां थी। आर्य-समाज और सनातन हिन्दुओं के ऐसे आपसी झगड़ों का जिक्र मैंने अन्यत्र किया है, जो ऐसे अवसरों पर हो जाया करते थे। जब तक मेघ, जाट, ओड और डोम आदि लोगों का शुद्धिकरण होता रहा, तब तक कुल-मिलाकर हिन्दू धर्म में सब-कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, परन्तु, होशियारपुर में कुछ भंगी लोगों को, जो पहले से ही कबीर-पंथी बन चुके थे, उनको शुद्धि की क्रिया द्वारा आर्य बनाया गया तो बड़ा बवाल हुआ। ऐसे लोगों को आर्य बनाने के बाद, जो पहले आर्य-भगत ( मेघ ) बन गए थे, उनके साथ सार्वजनिक रूप से सहभोज का आयोजन किया गया तो उस से सनातनी हिन्दुओं की भृकुटियां सातवें आसमान पर चढ़ गयी और आर्य-समाज को सनातनी हिन्दुओं के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा।

इस तरह की घटनाओं का विश्लेषण और मूल्यांकन करने वाले लोगों का निष्कर्ष यह रहा कि आर्य समाज ने पहले जिन हिन्दू बहिष्कृत जातियों का आर्यकरण किया था, वे अपेक्षाकृत अच्छे व्यवसाय या कामों में संलग्न थे और बाद में आर्य समाज अन्य निम्न पेशों से जुडी जातियों को भी आर्य बनाने लगा तो  इन शुद्ध किये गए लोगों को सनातनी लोगों ने इन शुद्ध किये गए लोगों के द्वारा किये जाने वाले कामों के लिहाज से बिलकुल ही शुद्धि के योग्य नहीं माना, फलस्वरूप आर्य समाज और सनातनी लोगों में तनातनी बढ़ गयी। इस के साथ ही विभिन्न पेशों और विभिन्न जातियों से आर्य बने लोगों का खुले रूप में सार्वजनिक तौर पर आपस में सहभोज तो सनातनी हिन्दुओं को कतई स्वीकार ही नहीं था। अतः पहले के शुद्धि कार्यक्रमों के वक़्त इतना विरोध नहीं हुआ, बल्कि पहले के शुद्धिकृत लोगों का जो विरोध था वह उनके द्विजत्व को लेकर विरोध था, अर्थार्त उन्हें ब्राह्मण या क्षत्रिय का दर्जा दिए जाने का विरोध था। आर्य समाज के आपसी सह-भोज के कार्य-कर्मों से सनातनी हिन्दुओं का वह विरोध सीधे-सीधे इस शुद्धिकरण को ही नकारने में बदल गया और सनातनी लोगों ने ऐसे लोगों को बहिष्कृत करना शुरू कर दिया। इसका प्रभाव आर्य समाज की बढती नफरी और लोकप्रियता पर पड़ा और शुद्धिकरण का आन्दोलन मंद पड़ने लग गया। समझने वाली बात यह है कि नीच कही जाने वाली और हेय समझे जाने वाले कामों को करने वाली जातियां अगर आपस में रोटी-बेटी के व्यवहार में एक होती है तो भी सनातनी हिन्दुओं को विरोध है और वे ऐसा नहीं होने देंगे। सनातनी हिन्दुओं ने सार्वजनिक रूप से आर्य समाज के विरोध में जहर उगलना तेज कर दिया। पंजाब में सनातनी लोगों ने इस विरोध को चमारों को आगे करके और तीव्र कर दिया। सनातनी हिन्दुओं के साथ चमार बढ़—चढ़कर सनातन धर्म के पक्ष में और आर्य समाज के विरोध में आ गए। इसका परिणाम यह हुआ कि आर्य समाज में जातिवाद घुस गया। समय गुजरने के साथ आर्य समाज और सनातनी हिन्दुओं में एक आपसी मौन स्वीकृति बन गयी। आर्य समाज ने नीच जातियों को शुद्धिकरण द्वारा आर्य बनाना छोड़ दिया और सनातनी लोगों ने आर्य समाज का विरोध करना छोड़ दिया। मारवाड़ में आर्य समाज और सनातनियों में इस तरह की ताना-तनी नहीं रही, परन्तु जब मेघवालों ने मृत गाय-बैल का चमड़ा उतारना और चमड़े से संबंधित सब तरह का काम छोड़ दिया तो उन पर तरह-तरह की विपत्तियाँ आ पड़ी और उन पर जोर-जबरदस्ती की जाने लगी। उनको अपने खेतों और गांवों से बेदखल किया जाने लगा। यह सब 20वीं शताब्दी के प्रारंभ की घटनाएँ है। उन्हें कुओं और तालाबों से पानी नहीं भरने दिया जाने लगा और सवर्ण जातियों द्वारा हर तरह का बहिष्कार किया जाने लगा। मेघवालों की पंचायतों ने सामूहिक रूप से इसका मुकाबला किया, उन्होंने अपने अलग कुँए और तालाब खोदकर ऐसी मुसीबतों का सामना किया। मेघवाल पंचायतों ने फरमान जारी कर दिया कि लाभ की अपेक्षा इज्जत बड़ी चीज है और अगर मेघवाल जाति में रहना है तो इन नीच कहे जाने वाले धंधों को या जिन कामों को करने से हिन्दू धर्म उन्हें नीच या अछेप मानता है, उसे छोड़ना ही पड़ेगा। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में इस इलाके में मेघवाल जाति ने इस पर पूरी तरह से बंदी लगा दी। इस बड़े आन्दोलन में उम्मेदाराम जी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। हालाँकि मेघवालों के सम्मान और स्वाभिमान का यह आन्दोलन जोधपुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों तक ही फैला हुआ था, परन्तु इसका दूरगामी प्रभाव अन्य जगहों पर भी पड़ा।

आप में से कई लोग यह जानते है कि विगत कई शताब्दियों में हमारे लोगों  पर आरोप लगाये जाते थे कि  ये लोग गंदे काम करते है, छोटे काम करते है, मरे हुए जानवरों को काटते है, उनकी खाल उतारते है, गंदे कपडे पहनते है, मरे हुए जानवरों का मांस खाते है। विभिन्न बदसूरत देवी-देवताओं को पूजते है, मांवडियों को पूजते है, अलख को थापते है, बाबे को धोख देते है, विधवाओं को घर में रखते है, उन्हें सीर-सरोकार देते है, विधवा-विवाह करते है, यज्ञ-बलि कर्म नहीं करते है, यज्ञोपवित-धारण के अधिकारी नहीं है, ब्राह्मण को भेंट-पूजा देकर शुद्ध या पवित्र नहीं होते है। शास्त्र-प्रमाण से ज्यादा ये अपने गुरु और परंपरा को प्रमाण मानते है। ऐसे बहुत से आरोप हमारे समाज पर लगते रहे और वे उन आरोपों से हमारी आस्था और आराधना की खिल्ली उड़ाते, हमारी बदहाली का क्रूर मजाक उड़ाते, और उनका फायदा उठाते। इस प्रकार के एक नहीं, दो नहीं, कई आरोप हम पर लगाये गए, फिर भी हमारा समाज विचलित नहीं हुआ। विगत शताब्दियों में इस समाज ने इन सब पर ध्यान दिया और जिन-जिन कारणों को जाति के पतन का कारण बताया जाने लगा, इस समाज ने उससे अपने को दूर करना शुरू कर दिया। इस दौर में जहाँ-जहाँ मेघवाल कौम निवास करती थी, वहां-वहां उसने अपने स्वतः संज्ञान से गंदे धंधे नहीं करने, मरे पशुओं का मांस नहीं खाने आदि की बंदिशे लगा कर इस जाति को ऊपर उठाने की कोशिश की, लेकिन कई जगहों के मेघवाल और उनकी पंचायते इन धंधों में आर्थिक लाभ देखते थे और इन्हें छोड़ने का साहस नहीं रखते थे। उन में और इन में जाति बहिष्कार का दंश भी 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में घुस गया। इस अवसर पर मैं उस पर चर्चा करना ठीक नहीं समझता हूँ, परन्तु यह कहना चाहता हूँ कि मेघवालों ने सम्मान और स्वाभिमान के जीवन को ही हमेशा वरीयता दी है। सामंती जातिवादी ढांचे में ढल जाने के बाद भी उन्होंने भिखारी का जीवन कभी नहीं जीया और लालच में कभी कोई हीन कर्म नहीं किया। अपने शील-सदाचार और सादगी के लिए मारवाड़ में यह कौम अपने नाम की धनि रही है।

  जो लोग मेघों के इन संघर्षों की थोड़ी-बहुत भी जानकारी रखता है, वह जानता है कि हमारे समाज के केरण बाबा ने इस सम्बन्ध में पहला ऐतिहासिक कार्य किया था, जो पंजाब में जा कर बस गए थे। उन के प्रयत्नों से इस जाति ने 1879 में इन गंदे कामों और अशुद्ध या अपवित्र कहे जाने वाले खान-पान से अपने को अलग कर दिया था, इसलिए आर्य-समाज के आन्दोलन को एक पृष्ठभूमि मिली, परन्तु ऐसा कर लिए जाने के बाद भी स्थितियां बदली नहीं। आज यह समाज ऐसे कारणों से दूर है फिर भी सवर्ण हिन्दू-मानसिकता इस जाति को सम्मान और गरिमा देने में खुला ऐतराज करती है तो हमें यह बात समझ में आनी चाहिए कि ऐतिहासिक रूप से आपकी जाति के नाम पर ‘अछूतपन’ से हिन्दू समाज ने जो कलंक लगा दिया है, वह आपके शुद्ध रहने से या गंदे या नीच कहे जाने वाले कामों के करने या नहीं करने से कोई ताल्लुक नहीं रखता है।            

                 विभिन्न जगहों में मेघवाल समाज में गरिमा और सम्मान को लेकर जो आन्दोलन हो रहे थे, उन गतिविधियों से इस इलाके की मेघवाल पंचायतें वाकिफ थी। यहाँ के लोग समय-समय पर लाहौर, पेशावर आदि जगहों पर आते जाते रहते थे। मारवाड़ के मेघवाल और सिंध के मेघवाल पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक- दूसरे से शादी-ब्याह, मौत-मर्तंग, खेती-बाड़ी, वेठ-बेगार, अकाल-सुकाल में एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए थे, जो आज भी कई हलकों में देखने को मिलता है। मेघवाल जाति अपने संप और सौहद्रय के लिए जानी जाती रही है, या गुण ही इस जाति की वास्तविक ताकत है। उस समय तिंवरी के मेघवाल उम्मेदाराम जी कटारिया आस-पास में होने वाली इन घटनाओं से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने जोधपुर और इसके आस-पास के परगनों के मेघवालों को एक दिशा और नेतृत्व देने का बीड़ा उठाया। सिंध और पंजाब में मेघ समाज ने सामूहिक रूप से शुद्धिकरण अपना कर आर्य-धर्म अपना लिया था, वैसा सामूहिक रूप से मेघवाल समाज मारवाड़ में आर्य-समाजी नहीं बना था। कुछ लोग आर्य-समाजी जरुर बने, परन्तु मेघ जाति का कोई सामूहिक शुद्धिकरण का कोई कार्यक्रम जोधपुर में नहीं हुआ। मेघवालों की पंचायतों ने भी आर्य समाज की अच्छी शिक्षा को ग्रहण करने का कोई विरोध नहीं किया, परन्तु आर्य समाज के शुद्धिकरण से न तो वे स्वयं जुड़े और न समाज को जोड़ा। उम्मेदाराम कटारिया ने मेघों की पुरातन परंपरा के अनुरूप ही उनके आराध्य और जम्मा-जागरण पर ही जोर दिया। वे मेघ समाज की इज्जत और आबरू को तो बढ़ाना चाहते ही थे, अतः रहन-सहन, खान-पान के साथ ही उनके समाज के जो लोग खेत-खलिहान के कार्यों लगे थे, उनका लाग-बाग़ और वेठ-बेगारी की रस्म के नाम पर बहुत शोषण होता था, उससे मेघ समाज को छुटकारा दिलाने के लिए जातीय-पंचायत के माध्यम से बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कार्य प्रारंभ किया।

         रहन-सहन की शुद्धि के साथ मेघवाल समाज की पंचायतें बैठ-बेगारी का जगह-जगह विरोध कर रही थी, परन्तु कोई विशेष परिणाम नहीं मिल रहा था। अतः मेघ लोग जो खेती-बाड़ी के कार्यों में संलग्न थे और बेगारी से ज्यादा त्रस्त थे, उनसे उन्होंने कई बार विचार-विमर्श किया और अपना मुख्य ध्येय मेघों के शुद्धिकरण की बजाय बेगारी उन्मूलन पर ही लगाया। इस समय खेत-खलिहान के साथ मेघवालों का कताई-बुनाई का धंधा कपास की कम पैदावार, साल-बाव के लगान की अत्यधिक बढ़ोत्तरी, रेजे के कम-ज्यादा होने पर अत्यधिक भार और जागीर को मुफ्त में नियमित रूप से कपड़ा देना आदि बहुत ही कठिन बन चुका था। समय-समय पर राज को जागीरों की ओर से दी जाने वाली मुफ्त सेवा में जागीरदारों या गाँव के छोटे-बड़े हाकिमों और पटवारियों द्वारा यह सेवा मेघवालों पर जबरदस्ती थौंपी जा रही थी, जिसकी कहीं पर भी कोई सुनवाई नहीं होती थी। इसलिए वे मेघवाल समाज को आर्य समाजी बनाने से ज्यादा जरुरी इस समाज को बेगारी और बाव( कर ) आदि से छुटकारा दिलाना मानते थे, और इसी अनुरूप वे समाज सुद्धार के कार्य में लगे रहे। आर्य समाज की अच्छी शिक्षा को ग्रहण करने का उन्होंने कोई विरोध नहीं किया और अगर हरिद्वार-होम से आदमी शुद्द होता है, तो मेघवाल समाज उसको अपना सकता है। चूँकि सार्वजनिक रूप से यहाँ का मेघवाल समाज आर्य-समाजी नहीं बना था, अतः हरिद्वार और होम को स्वीकार करने या न करने की छूट स्थानीय पंचायतों को थी। किसी भी ऐसे काम से जिस में अशुद्धता या अपवित्रता देखी जाती थी, उस में अब जम्मा-जागरण और न्यात-भोज के साथ हरिद्वार की रस्म भी कहीं-कहीं पर मर्जी से जुड़ने लग गयी थी। 



सामंती वेठ-बेगारी और जन-नायक उम्मेदाराम-

               हम इस बात से वाकिफ है कि देश आजाद होने से पहले राजस्थान में कईं देशी रियासते थी और वे अंग्रेजों के अधीन गुलाम थी। मारवाड़ की रियासतें भी अंग्रेजों के अधीन थी, जिसका पूरा तंत्र सामंतों के कब्जे में था और समाज वेठ-बेगार के जुल्म और अत्याचार से आतंकित था। हर सामंती समाज में बेगारी प्रथा एक आवश्यक अंग थी। सारे भारत में यह किसी न किसी रूप में प्रचलन में थी। बेगार का मतलब किसी को मजदूरी का पारिश्रमिक दिए वगैर उससे काम करवाना था अर्थात यह मजदूरी-रहित श्रम था, जो छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों से लिया जाता था। यह बेगारी की प्रथा दासता की प्रथा से अलग थी, दासता को ख़त्म करने में जहाँ एक ओर सामंतों ने उदारता दिखाई, वहीं सामंतों ने बेगारी प्रथा को प्रमुखता से बनाये रखा, जिसके कारण छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों को कई तरह का जुल्म और अत्याचार सहना पड़ता था। इसकी अत्यधिक पीड़ा मेघवाल जाति ने भोगी, सामंती जातिवादी समाज में मेघवाल जाति बेगारी के लिहाज से एक ‘काजू-कौम’ मानी जाती थी। 

                जोधपुर, बाड़मेर और जैसलमेर आदि मारवाड़ किए विभिन्न इलाकों में मेघवाल लोग सघन रूप से बसे हुए थे, जहाँ वेठ-बेगार का रिवाज व्यापक रूप से प्रचलित था। मारवाड़ में यह वेठ-बेगार जजमानी की एक सुदृढ़ परंपरा बन गयी थी। जागीर के गांवो में रैयत यानि प्रजा द्वारा बिना मजदूरी या पारिश्रमिक के जागीरदारों या छोटे-बड़े हाकिमों के काम करना लाजिम समझा जाता था। मेघवालों सहित तक़रीबन हर जाति इससे त्रस्त थी। मेघवालों को और अन्य लोगों को जो खेत-खलिहान से जुड़े होते थे, उन्हें बंदोबस्ती इकरारनामे के द्वारा भी वेठ-बेगार हेतु बाध्य किया जाता था। यह शोषण की एक अतिरंजित क्रूर प्रथा थी। फसल का आधे से तीन चौथाई हिस्सा जागीरदार या उनके रिश्तेदार ले जाते थे। इसके अलावा जोधपुर रियासत में और भी कई तरह के लाग-बाग़ थे, यथा लड़की की शादी पर ‘चंवरी-लाग’, सामूहिक भोज पर ‘कांसा-लाग’, अगर परिवार का कोई सदस्य परिवार से अलग होकर अलग घर बनाता तो ‘धुंवा-लाग’, कपड़ा बुनने वालों पर ‘साल-बाव या साल-लाग’ और जूता बनाने वालों पर ‘सिलाडी-बाव’ आदि कई तरह के लाग-बाग़ और नजराने मेघवालों सहित अन्य लोगों को जागीरदारों को देने पड़ते थे। गाँव में किसी जागीरदार, हाकिम, ठाकुर या उसके रिश्तेदार के कोई मेहमान आ जाता तो उसके ढोर-ढँकार की देख-रेख करना, उसके चारे-पानी की व्यवस्था करना, उसकी सेवा-चाकरी करना आदि कई तरह के बेगार के कामों से उनका शोषण होता था।गांवों में बहुत से काम बैठ-बेगार के नाम से मेघवालो से मुफ्त में करवाए जाते थे। वैठ- बेगारी के रूप में सामंती समाज में मेघवाल कौम एक काजू कौम के रूप में जानी जाती थी अर्थात इन से हर तरह की बेगार करवाई जाती थी। यह रस्म या प्रथा गुलाम या दास प्रथा नहीं होते हुए भी दास-वृति से कम नहीं थी। इन प्रथाओं से छुटकारा पाने के लिए मेघवाल समाज ने सन 1915 से जगह-जगह पर प्रतिरोध आन्दोलन करने शुरू कर दिए थे।

                अगर देखा जाय तो बैठ-बेगारी के विरुद्ध मेघवालों का यह प्रतिरोध-आन्दोलन छोटे और मध्यम दर्जे के किसानों का आन्दोलन था। मेघवालों के ये आन्दोलन राष्ट्रिय परिप्रेक्ष्य में नहीं आ सके, इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि इनका दस्तावेजीकरण नहीं हो सका और साथ ही देश के स्वतंत्रता आन्दोलन की आवाज में इनके ये स्वाभिमान और सम्मान के आन्दोलन दब कर रह गए। शहर में जागीरदारों और ठाकुरों के विरुद्ध जयनारायण व्यास के नेतृत्त्व में सन 1938 में मारवाड़ लोक-परिषद का गठन हुआ। जिसे कांग्रेस ने समर्थन दिया। यह मारवाड़ हितकारिणी सभा के नाम से भी ज्ञात हुई। जोधपुर से इत्तर नागौर और सीकर आदि में ऐसे आंदोलनों की शुरुआत जाटो ने की, जो कृषि कार्यों में संलग्न थे और मेघवालों की तरह ही बेगारी से त्रस्त थे। मेघवालों के इन लम्बे आंदोलनों से प्रेरित होकर राजकीय सेवा से निवृत होने के बाद बलदेवराम मिर्धा ने सन 1940 में नागौर में मारवाड़ किसान सभा के  बैनर तले बेगारी के विरुद्ध ऐसे आन्दोलन की ‘शुरुआत की। इसका परिणाम यह हुआ कि कृषि-कार्यों में संलग्न और बेगारी से त्रस्त इन मेघों के इन आन्दोलनों को बाद में किसान-आन्दोलन में समाहित कर दिया गया और उनके आन्दोलन की महत्ता और उनका महत्त्व समाप्त कर दिया गया। सन 1943 को किसान सभा के सम्मलेन में पंजाब के राजस्व-मंत्री छोटूराम को आमंत्रित किया गया था, जो वहां पर किसानों के लिए संघर्षरत थे। फलस्वरूप किशन सभा के नेताओं को पहचान मिली। जयनारायण के नेतृत्त्व में बलदेवराम मिर्धा की किसान सभा आगे जाकर जयनारायण व्यास की मारवाड़ हितकारिणी सभा में मिल गयी और कांग्रेस के राष्ट्र-व्यापी ढांचे का हिस्सा बन गए। इन सब परिस्थियों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि मेघवालों के आन्दोलनों की उर्जा को अन्य लोगों ने अपने हित-साध्य का आलंबन बना दिया और वे शिखर पर पहुंचे, वहीँ यह समाज ठगा हुआ-सा वहीँ का वहीँ रह गया। यहाँ की मेघवाल कौम ने बेगारी से छुटकारा पाने के लिए हर स्तर पर इसके विरुद्ध संघर्ष किया और आजादी से पहले इस से निजात प्राप्त कर ली, परन्तु कई जगहों पर यह किसी न किसी रूप में फिर भी व्याप्त रही, अतः यह नहीं कह सकते है कि सम्पूर्ण राजस्थान में या जहाँ-जहाँ मेघवाल जाति है, वहां इसने उसी समय एक साथ मुक्ति प्राप्त कर ली थी। कहने का तात्पर्य यह है कि अलग-अलग जगहों पर गंदे-धंधों से उन्मुक्ति और बेगारी से छुटकारा अलग-अलग समय पर पाया। इसलिए इस जाति का एक-सा स्वरुप नहीं उभर सका। यहाँ पर उन सब पर चर्चा करना उपयुक्त नहीं है, बल्कि इस सम्बन्ध में जन-नायक उम्मेदाराम जी कटारिया के जो ऐतिहासिक प्रयास थे, उसे उजागर करना चाहूँगा, जिनके महत्ती प्रयत्नों से यहाँ की मेघवाल कौम ने स्वाभिमान और सम्मान का जीवन जीने का जज्बा प्राप्त किया।





तिंवरी में समाज-सुधार सभा

                मेघवाल समाज को स्वाभिमान और सम्मान से जीवन जीने के लिए कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा। उन पर यहाँ चर्चा करने का कोई औचित्य नहीं है। यह सुग्यत है कि मेघवालों ने अपने स्वाभिमान और सम्मान के लिए अपनी जमीन पर रहते हुए भेदभाव और भेंट-बेगार से छुटकारा पाने के लिए संगठित-रूप से  प्रयास किये है। उनके आन्दोलनों की रुपरेखा पंचायतो के माध्यम से हर-एक व्यक्ति तक पहुंचती थी। मेघवालों की हैठियाल स्थिति और विपिन्न परिस्थितियों को देखते हुए 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में कई लोग समाज-सुधार हेतु आगे आये, जिस में जोधपुर के पास बसे तिंवरी गाँव के उम्मेदाराम मेघवाल प्रमुख थे। उम्मेदाराम जी ने मेघवाल समाज की सब घटनाओं और स्थितियों को ध्यान में रखते हुए संवत् 1972 के फाल्गुन वदी 6 (छठ) तदनुसार दिनांक 3 मार्च सन् 1915 को अपने बलबूते पर मेघवाल समाज की एक बड़ी पंचायत (आम सभा) अपने गांव तिंवरी में बुलाई। इसका पूरा खर्चा और व्यवस्था उम्मेदाराम जी ने अपनी निजी हैसियत से वहन किया था। हालांकि उस समय आवागमन के साधन नहीं थे, एक जगह से दूसरी जगह जाना बड़ा कठिन था, पर उम्मेदाराम जी ने सभी पंचो को निमंत्रण देकर बुलाया। उस समय सारी जगहों में मेघवालों में नये समाज के निर्माण के लिए और वेठ-बेगारी से छुटकारा पाने के लिए जबरदस्त उत्साह, प्रेरणा और साहस था। उस समय की परिस्थितियाँ भी कुछ ऐसी ही थी। अतः उम्मेदाराम जी के एक बुलावे पर मेघवाल समाज की विभिन्न पंचायतों के लोग तिंवरी में इक्कठे हुए। उस समय इसकी शुरूआत नौ पट्टी की पंचायतों के जुड़ने से हुई। मारवाड़ की कई पट्टियों से पञ्च तिंवरी में इकट्ठा हुए, परंतु उसमें नौ पट्टी आगीवाण हुई। उसमें इन नौ पट्टियों ने सक्रिय भाग लिया- 1.तिंवरी, 2.जेलू, 3.चेराई, 4.ओसियां, 5.नाथडाउ, 6.गांगाणी, 7.केरु, 8.आगोलाई और 9.जोधपुर शहर। इस महत्वपूर्ण सभा ने उम्मेदाराम को इस कार्य में लगने का सहस और संबल प्रदान किया, अस्तु; वे  इस काम को मूर्त रूप देने के लिए कृत-संकल्प हुए। मारवाड़ के मेघवालों का यह अब तक का ज्ञात प्रथम नागरिक-विद्रोह या प्रतिरोध था।     

इस पंचायत (आम सभा) में ‘मेघवंशी समाज सुधार सभा का गठन’ ( 1915 ) किया गया। जिसमें उम्मेदाराम जी को सर्वसम्मति से इस सुधार सभा का अध्यक्ष चुना गया। उनकी सर परस्ती में राजबाग, जोधपुर के श्री सुगालाराम भाटिया को उपाध्यक्ष बनाया गया। अन्य प्रमुख पंचों में शाहपुरा(जोधपुर) से जेठाराम कड़ेला, घेवड़ा से जेठाराम कड़ेला, गांव जुड़ से राजुराम लीलड़, राजबाग(जोधपुर) से प्रतापाराम कडेला, मथानिया से सुजाराम इणखिया, पुंजला से धर्माराम पंवार, चेराई से जुगताराम लीलड़ और चामु से ताराराम कड़ेला आदि सर्वसम्मति से मनोनीत किये गए। इन्होंने समाज में एकता और जागृति पैदा करने में दिन-रात एक कर दिया। वेठ-बेगार नहीं करने और गंदे धंधे नहीं करने की आण के साथ ही समाज के लोगों को गरिमामय जीवन जीने के सूत्र दिए गए और किसी भी ऐसे धंधे को, जो नीच या हीन माने जाते हैं, उसको समाज के किसी भी आदमी के द्वारा नहीं करने का निर्णय लिया, हीन समझे जाने वाले धंधो को करने वालो को दण्डित करने और समाज से बहिष्कृत करने का भी एलान किया। मारवाड़ में इस समाज-सुधार सभा के आन्दोलन को मेघवालों का ‘खुली-बंदी का आन्दोलन’ भी कहा जाता है। इसका मतलब यह था कि मेघवाल जाति के लोग गंदे और नीच कहे जाने वाले धंधों को तुरंत तिलांजलि दे दे, जो मेघ जाति से है, उनके लिए पंचायत के निर्णय के दिन से ही वे धंधे बंद है। जो मेघवाल पंचायत में रहना चाहता है, उसे इसे मानना या जाति से बाहर होना के विकल्प खुले थे। निर्णय स्वीकार कर लिए जाने के बाद भी कोई ऐसे कामों में लिप्त पाया जाता तो उस पर बहुत बड़ा दंड डाला जाता था और जाति-बिरादरी से बाहर कर दिया जाता था। जो लोग इस निर्णय के पक्ष में नहीं थे, वे खुले या मुक्त थे। इस समय जो-जो पंचायते इस समाज-सुद्धर के निर्णयों की पालना करने लगी, उसका उल्लेख नीचे किया गया है। इस प्रकार से मेघवालों की इस सुधार सभा ने कई महत्वपूर्ण उद्देश्य अपने सामने रखे और महत्त्वपूर्ण कार्य किये, जिसका लेखा-जोखा अभी भी किया जाना अपेक्षित है।

मेघवाल समाज का फैलाव सिंध से लेकर मारवाड़ तक सघन रूप से था और लोग अकाल और लाग-बेगार के कारण इधर-उधर बिखरे हुए थे। उन्हें एक सूत्र में बांधने का काम  इस मेघवाल सुधार सभा ने बड़ी दूरदर्शिता और लगन से किया, जिससे मेघ लोग वेठ-बेगार और शोषण के विरोध में सफल संघर्ष करने हेतु एकजुट हो सके और बेगारी के खिलाफ इस आंदोलन को सफल बना पाये। यह सुधार सभा स्यालकोट और लाहौर की ‘मेघ सुधार सभा’ के नक़्शे-कदम पर ही गठित हुई थी। यह उमेदाराम जी के कुशल नेतृत्व का ही परिणाम था। मेघ समाज के संत-पुरुष केरण बाबा ( केरण वाले बाबा ) ने महाराजा गुलाब सिंह के राज में मरे हुए जानवरों का मांस नहीं खाने और गंदे या हीन समझे जाने वाले कामों को नहीं करने का जो इकरार किया था, उसके अनुरूप मारवाड़ में उम्मेदाराम जी कटारिया ने समाज में जाग्रति पैदा करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। विभिन्न रियासतों में मेघवालों ने राज-सरकार से बराबरी का हक़ देने और बैठ-बेगार रोकने के लिए परिवेदन और दरख्वास्तें भी दी, विभिन्न राजा-महाराजाओं के सामने इन्होने अपने साथ हो रहे भेदभाव और अन्याय के विरुद्ध में पक्ष रखा। उन सबका इन्हें कही पर संबल मिला तो कहीं पर निराशा भी हाथ लगी। महाराजा हरिसिंह ने अपने राज्य में सभी मंदिरों, कुओं और सार्वजनिक शिक्षा स्थानों को सभी के लिए खोलने का एलान किया। अंग्रेजों के अधीन रियासतों के राजा-महाराजाओं को भी इसी लाइन पर चलने को मजबूर होना पड़ा, परन्तु उनके अधीन कई हाकिम, जागीरदार और सामंत इस में कोताही कर मेघों के तबाही के कारण भी बने। आजादी के साथ-साथ इस अमानवीय प्रथा से मेघवाल लोगों ने छुटकारा पाया।         

  

अग्रणीय मेघ पुरुष श्री उम्मेदाराम कटारिया और मेघवंशी समाज सुधार सभा का संगठन कार्य:

                श्री उम्मेदाराम जी दूरदृष्टा और परिपक्व नेता थे। उनमें संगठन की अद्भुत शक्ति थी। अपने कुशल नेतृत्व के गुणों के कारण वे सबके आदर के पात्र थे। गुलाम भारत की जोधपुर रियासत में भी उनका बहुमान था! मारवाड़ में प्रजा मंडल, कांग्रेस की हरिजन सेवा समिति या सेवक-संघ आदि की शुरुआत या स्थापना होने से पहले ही उम्मेदाराम जी के नेतृत्व में मेघवाल समाज बेगारी और सामंतो के जुल्म के विरुद्ध आंदोलनरत था। सन 1920 के बाद में जब ये संगठन कार्यरत हुए तो मेघवालों का यह आन्दोलन ऐसे संगठनों के देश-व्यापी वर्चस्व का शिकार हो गया और उस देश-व्यापी आन्दोलन में मेघवालों के स्वाभिमान और सम्मान के इस संघर्ष को मिलाकर भुला दिया गया। देश-व्यापी आन्दोलन का नेतृत्व गैर-अछूतों के हाथों में था, जबकि मेघों के स्वाभिमान और सम्मान हेतु किया गया बेगारी-उन्मूलन आन्दोलन मेघवालों के हाथों में ही अर्थात यह मेघों के नेतृत्व में ही था। मारवाड़ के इस इलाके में जोधपुर के जयनारायण व्यास ने, जो बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री भी बने, सन 1938 में मारवाड़ हितकारिणी सभा बनायीं, जिसका घोषित उद्देश्य सामंतों और जागीरदारों के विरुद्ध संघर्ष करना ही था। जयनारायण व्यास ने सन 1940 में जाटों को भी इस आन्दोलनों से जोड़ा और बलदेवराम मिर्धा के साथ मिलकर किसान सभा बनायीं, जो जागीरदारों और हाकिमों और ठाकरों द्वारा किसानों पर किये जा रहे जुल्मों के विरोध में आवाज उठाते थे। ये संगठन मेघवालों के प्रतिरोध-आन्दोलनों के प्रति-पूरक थे, अतः  उम्मेदाराम जी और उनके साथी प्रजा मंडल, मारवाड़ हितकारिणी सभा या किसान सभा आदि से जुड़ गए, फिर भी वे अपने समाज के सुधार को लेकर प्रतिबद्ध थे और चाहते थे कि मेघवालों में अपने समाज के सुधार हेतु उनका अपना नेतृत्व उभरे। इस हेतु ही उन्होंने समाज सुधार सभा का गठन किया था, अतः उसको जारी रखना जरूरी था, साथ ही गैर-अछूतों के नेतृत्व वाले संगठन एक तरफ जागीरदारों से सहयोग और लाभ चाहते थे तो दूसरी ओर मेघवाल समाज जिस जुल्मो और ज्यादतियों के विरोध में खड़ा होता था, वहां वे मजबूती से उनके साथ खड़े नहीं होते थे। इन सब परिस्थितियों के मध्य-नजर प्रजा-मंडल, किसान-सभा, हरिजन सेवा समितियों के गठन के बाद भी उम्मेदाराम मेघवालों की पंचायत को मजबूत बनाने में जुटे रहे।

                उन्होंने मेघवालों के पंचायत के दायरे को मजबूत बनाने हेतु 1915 में जो संकल्प लिया था, उसे उन्होंने जीवन-पर्यंत छोड़ा नहीं था। आयु क्षीण हो जाने के बाद भी वे बुढ़ापे में भी अपने समाज का मार्ग-निर्देशन करते रहे। वे यह बात भली भांति जानते थे कि अपने खुद के नेतृत्व के बिना यह समाज आगे नहीं बढ़ सकता है, वे अपनी सभाओं में बहुधा कहा करते थे कि ‘हमारा सशक्त संगठन नहीं होने से दूसरे लोग हमारा नेतृत्व करना अपनी हकदारी समझते है और हमें ‘हेठियाल’ समझते है। इन दूसरे नेताओं की नज़रों में हमारी कीमत भेड़-बकरियों के बराबर ही है। इसलिए इससे उभरने के लिए हमारी पंचायत पट्टी को मजबूत करना बहुत जरुरी है।‘ उन्होंने मेघवालों के पंचायती गणतंत्र को पुनः मजबूती देने के लिए पूरी ऊर्जा लगा दी और जीवन-भर उसके लिए कार्य करते रहे।

                नौ पट्टी को साथ में लेकर सबसे पहले उमेदाराम जी ने चौदह पट्टियों का पुनर्गठन किया। ये 14 पट्टियां निम्न तरह से गठित की गयी---

        1. तिंवरी, 2. ओसियां, 3. आगोलाई, 4. गंगाणी, 5. चेराई, 6. लोहावट, 7. जेलू, 8. इंद्रोका, 9. केरु, 10. बेलवा (इन्दावटी), 11. केतू (गोगादे), 12. सेतरावा ( देवराज), 13. देचू (चाडदे) और 14. मथानिया।
                इन सब का न्याय क्षेत्र और सीमा निर्धारण भौगोलिक हिसाब से परम्परागत रूप से अनुभव और कायदे से किया गया। इन पट्टियों के मुख्यालय को मथारा के नाम से पुकारा जाता था। मथारा यानि प्रमुख, सदर। इन मथारों के अधीन आने वाले गांवों और बस्तियों के सभी प्रकार के बाहरी और आतंरिक झगड़ों-झमेलों, वादों और अन्याय-अत्याचारों को माकूल तरीके से निपटने का अधिकार इन मथारों को दिया गया। इन के अधीन आने वाले गांवों को खेड़ा या बाड़िया कहा गया। इन मथारों की सीमाएं उनके अधीन आने वाले गांवों तक थी, जो इस प्रकार से निर्धारित की गयी थी-

 1 तिंवरी मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 8 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे-1. तिंवरी, 2. बलरवा, 3. बींजवाड़ीया, 4. कोरडा, 5. गोपासरिया, 6. बड़ो, 7.बडला और 8. बीजारिया।

 2.मथानिया मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 10 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.मथानिया, 2. चौपासनी, 3. जुड़, 4. उम्मेदनगर, 5. रामपुरा, 6. माणकलाव, 7. कोरडा, 8. बिंजवाडिया, 9. देवता की ढाणी और 10. बासनी (लाछा).

 3. ओसियां मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 14 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.ओसियां, 2. बड़ा बास, 3. दुनाडा, 4. बैठवासिया, 5. थोब, 6. पिण्डजी की ढाणी, 7. रमलाड़ा 8. पलासला, 9.खिटोकोर, 10.तापु, 11. बांरा, 12. नेवरा, 13. भियाडिया और 14. होंणीया।

 4. चेराई मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1. चेराई, 2. मीनो री ढाणी, 3. बेह, 4. खेतासर, 5. बडोडा गांव, 6. घेवड़ा, 7. चामु, 8. पांचला, 9. डाबडी, 10. खाबडा, 11. बारनाउ और 12.बडला।

 5. लोहावट मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1. लोहावट ( बिश्नोई बास), 2. लोहावट( जाटा बास), 3.भाकरी, 4. भेड, 5. ढेलाणा, 6. सांवडाउ, 7. हरलाई, 8. भीकमकोर, 9. नौसर, 10. पल्ली, 11. निम्बों का तालाब और 12. मुंजार।

 6. जेलू मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 18 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1. जेलू, 2. गगाड़ी, 3. खुडियाला, 4. चिड़वाई, 5. बिराई, 6. उटाम्बर, 7. संतोड़ा, 8. माँलूंगा, 9. नेरवा, 10. बासनी (भाटिया), 11. डिगड़ी, 12. बड़ों, 13. चोंचलवा, 14. बीजारिया, 15. बडोडा गांव, 16. घेवड़ा, 17. बिराई ( मोटल बास) और 18. बिराई ( बिछलों बास)

 7. आगोलाई मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1. आगोलाई, 2. भटलाई, 3. दुगर, 4. कोरना, 5. सुरानी, 6. तुलेसर, 7. बावरली, 8. राजवा, 9. घटियाला, 10. हिंगोला, 11. मेगलाया और 12. बासनी ( मनना)

 8. केरु मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1. केरु, 2. बेरु, 3. लोरडी, 4. मेघलाया, 5.राजवा, 6.गोलासनी, 7.चांवडा, 8.बड़ली, 9.भाकर वालो बास, 10.नारवा, 11.सालोड़ि और 12.नेरवा ।

 9. इन्दरोका मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.इन्द्रोका, 2.बालरवा, 3.बेरु, 4.बींजवाड़ीया, 5.नारवा, 6.गोयलो की ढाणी, 7.गंढ़ेरों की ढाणी और 8.चोखा ।

 10.बेलवा मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 24 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.बेलवा, 2.गोपालसर, 3.बस्तवा (माता), 4.बस्तवा (सुण्डा), 5.भालू (राजवा), 6.भालू (बड़ा बास), 7.भालू (रतां), 8.बेरा, 9.देयातु, 10.डेरिया, 11.मेंरिया, 12.जुठिया, 13.जोल्याला, 14.जीया बेरी, 15.घुडीयाला, 16.बालेसर(सत्ता), 17.बालेसर(दुर्गावता), 18.कुई(इंदा), 19.कुई(बामण), 20.अजबार, 21.निम्बों रो गांव, 22.राजवतों की ढाणी, 23.बेलवा(खत्री) और 24.भालू(कुमाणिया) .

 11.केतु (गोगादे पट्टी) मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 18 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.केतू(बडो बास), 2.केतू(हमो), 3.केतू(मदा), 4.सेखाला, 5.खिरजों, 6.तेना, 7.भूंगरा, 8.शेरगढ़, 9.रायसर, 10.टिम्बडी, 11.साई, 12.गड़ा, 13.सोइन्तरा, 14.भांडू, 15.सियोदों, 16.भोजो का बास, 17.केतू(मोनवता) और 18.आँवारो बास ।

 12. सेतरावा (देवराज पट्टी) मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 15 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.सेतरावा, 2.सोलंकियातला, 3.सोमेसर(सौमेर), 4.जेठानिया, 5.बुड़किया, 6.कलाउ, 7.देसानिया(दासानिया), 8.खिंयारिया(खियासरिया), 9.चौरड़िया, 10.देड़ा, 11.खनोडि, 12.लोहारंद, 13.कानोडिया, 14.हापों और 15.डेढों ।

 13. देचू (चाड दे पट्टी) मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 12 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.देचू, 2.ठाडिया, 3.गिलकोर, 4.भोजोकोर, 5.कोलू, 6.ऊठवलिया, 7.आरलाई(आसारलाई), 8.सगरो, 9.मडला(पनी), 10.मडला(सूक), 11.कनोडिया और 12.मडला(बडा)

 14. गंगाणी मथारा व पट्टी- इसके अधीन आने वाले 16 खेड़ा या बाड़िया निर्धारित किये गए, जो निम्न थे- 1.गंगाणी, 2.कासटी, 3.भवाद, 4.नेतडा, 5.हरडानी, 6.घडाव, 7.खारी, 8.सालवा, 9.खरड़ा, 10.कैलावा, 11.बावड़ी 12.बुडकिया, 13.थबुकड़ा, 14.दईकडा, 15.गेलाव, 16.लूणावास, 17.सुरपुरा और 18.जाजीवाल आदि।

                इन मथारों के गठन को लेकर मेघवाल समाज के सभी खेड़ों से सन् 1915 से लंबा विचार विमर्श चला। जिसमें उमेदाराम जी कटारिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही और उनकी सरपरस्ती में मेघवाल समाज ने पंचायत के इन मथारो के गठन का संकल्प लेकर इसको हकीकत में ढालने का काम हाथ में ले लिया। सुधार-सभा या पंचायतों के गठन हो जाने से वेठ-बेगार और जोर-जबरदस्ती के विरुद्ध सभी एक साथ प्रतिरोध में उतरने लगे, जिससे मेघवाल समाज में एक नयी जान आ गयी और समाज की कमजोरियों और अच्छाईयों का भी पता लगने लग गया। सभी खेड़ों के प्रस्तावित मथारों की नैतिक और सामाजिक मजबूती देखकर सन् 1920 में इनका  विधिवत गठन कर दिया गया। जो जो मथारे प्रस्तावित किये गए थे और उनके मातहत आने वाले गांव तय किये थे, उनमें एक-दो मथारों में एक- दो गांव इधर-उधर करके इसको असली जामा पहना दिया। मेघवाल समाज के प्राचीन पंचायती गणतंत्र को नव-जीवन देने का श्रेय निःसंदेह उम्मेदाराम जी कटारिया को ही जाता है, क्योंकि उन्होंने हर प्रकार की विपत्ति का सामना करते हुए समाज को सम्बल देते हुए इसे अंजाम दिया।अपना घर फूँक कर निस्वार्थ भाव से समाज का नेतृत्व करने का यह एक बेमिसाल उदाहरण है। इन 14 मथारों के अस्तित्व में आने और सक्रिय होने पर चौरासी का भी पुनर्गठन किया गया। यह 14 मथारों का एक ‘भुवन’ चौरासी में भी आगीवाण रहा।

                लगातार पांच-छः वर्षों तक ऐसा संघर्ष करने से जब उनको पूरा विश्वास हो गया कि मेघ समाज अपना खुद का नेतृत्व खुद कर सकता है और उस पर आने वाली हर मुसीबत का मुकाबला अपने स्तर पर कर सकता है तो जो मेघवाल समाज सुधार सभा का ताना-बाना बुना था, उसको असली जामा पहनाने के लिए एक विशाल आम सभा बुलाने का निर्णय लिया। सभी गांवों के पंचो और मौजिज लोगों को इकट्ठा कर, उनसे विचार विमर्श कर समाज सुधार सभा के विधिवत गठन हेतु बालरवा में न्यात बुलायी गयी। इसका मुख्य उद्देश्य बेठ-बेगार और अत्याचारों के खिलाफ संगठित संघर्ष करना था। यह मेघवालों के सामाजिक-विद्रोह का दूसरा बड़ा चरण था। मेघवालों के इस प्रतिरोध आन्दोलन या नागरिक विद्रोह में संघर्ष की रणनीति, उसमें आने वाली परेशानियां, दूसरी जाति-बिरादरी द्वारा मेघवाल समाज के बहिष्कार की स्थिति में उसका मुकाबला करना और समाज के आंतरिक लाग-बाग और रस्मों-रिवाज आदि कई पहलुओं पर भी इस न्यात में मंथन करने का तय हुआ।

                यह विशाल जन-आंदोलन एक सभा के रूप में दिनांक 6 फरवरी, 1920 (संवत् 1976 के चैत की शुक्ल पक्ष की छठ) को गांव बालरवा बावड़ी पर उम्मेदाराम जी कटारिया की अध्यक्षता में हुआ। इस सभा में जगह-जगह से मेघवाल समाज के प्रतिनिधि सरीक हुए और एक मत से मेघवालों की अपनी पंचायती व्यवस्था को नया रूप देने का प्रस्ताव पास किया और जो 14 पट्टियों की रूपरेखा बनायी गयी थी, उसे न्यात ने एक-दो मथारों में एक-दो गांव इधर-उधर करते हुए उनकी सीमा को भी सर्व-सम्मति से मंजूरी दे दी। इस प्रकार से समाज सुधार सभा का विधिवत गठन 6 फरवरी 1920 को होना माना जा सकता है, हालाँकि इसके शुरुआत की नींव सन 1915 में ही पड़ चुकी थी।

                वर्तमान में मेघवाल समाज में जो न्यात के मथारे और पञ्च-पंचायती की मर्यादाएं है, वे इसी सभा की देन है। मारवाड़ के मेघवालो के इतिहास में अपनी तरह की यह पहली सभा या सम्मेलन था, जिसमें बेगारी, गैर बराबरी और अन्याय-अत्याचार के विरोध में खुलकर इस समाज ने सामूहिक रूप से चर्चा की और सामूहिक रूप से बेगारी के विरुद्ध खिलाफत का बिगुल बजाया। मेघवालों का यह एक नागरिक-विद्रोह था। इसके बाद ऐसा एक भी मौका नहीं आया, जिसमें मेघवालों ने पीछे मुड़कर देखा हो। वे हर जगह पर और हर स्तर पर संगठित होकर मुकाबला करते रहे। मथारों और खेड़ों के निर्धारण के साथ-साथ हर गांव और तहसील में भी सभाएं करने और वहां पर अनुभवी लोगों का दल बनाने का निर्णय भी इस न्यात में लिया गया। इस से गांवों में निवास करने वाले मेघों में एकता, स्फूर्ति और जागृति का ऐतिहासिक संचार हुआ। गांवों के पंच अपने-अपने क्षेत्र में इस पर पूरी निगरानी और नियंत्रण रखने लगे। गांवों के पंच अपने प्रभाव से समाज के नियमों का पालन करते हुए बेठ-बेगार और सामंती जुल्म के खिलाफ एकजुटता से लग गए और जहाँ कहीं भी ऐसा वाकया होता वे ढाल बनकर वहाँ खड़े होते और शोषण के खिलाफ संघर्ष करते।  मेघवालों का यह ‘बेगारी-उन्मूलन आन्दोलन’ आजादी के वृहत् आन्दोलन में दब गया।





शोषण-मुक्ति का वर्ष-

                मेघवाल समाज के  इन नागरिक-विद्रोह और प्रतिरोध आंदोलनों के संगठित प्रयासों से इन क्षेत्रों में बेठ-बेगार आजादी से बहुत पहले ख़त्म हो गयी। इसमें बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर की विचारधारा का प्रभाव, जिसे पंच लोग 'उमेदगारी' कहते थे, के साथ-साथ, यूनीयनिस्ट मिशन, कांग्रेस और आर्य समाज के प्रयासों से मेघवाल समाज को बहुत बड़ा सम्बल मिला, जिसका वर्णन अन्यत्र किया गया है। मेघों के इतिहास में सन् 1920 का वर्ष 'शोषण से मुक्ति' का वर्ष माना जाता है। यह वर्ष अंग्रेजी हकुमत और रियासत के शोषण से मुक्ति की चेतना से लबरेज था। सभी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी मेघों ने बेठ-बेगारी के शोषण के जाल को उतार फेंक दिया। इसमें मेघों की बुजुर्ग पीढ़ी की सूझ-बूझ और चेतना की जितनी प्रशंसा की जाय, उतनी ही कम है। जब हर गांव में राजपूतों और जागीरदारों का भयंकर आतंक और शोषण था और खेत-खलिहानों के कोई पट्टा-पूली नहीं थे, कमाई के कोई साधन नहीं थे और सेठ-शाहूकारी के कर्ज के बोझ तले पूरा समाज पिस रहा था, तो ऐसे में उमेदाराम जी जैसे कर्मठ मेघ पुरुषों को हिम्मत और होशियारी से ही यह समाज इनके चंगुल से अपने को आजाद करा पाया।

              इस सम्मेलन या न्यात में उमेदाराम जी कटारिया की अध्यक्षता में 14 पट्टी के जो प्रमुख़ पंच सम्मलित हुए, उनमें मुख्यतः लोहावट से उमेदाराम जयपाल, घेवड़ा से जेठाराम कड़ेला, चामु से ताराराम कड़ेला, बेलवा से चुतराराम लिखणिया, मथानिया से लाभूराम पालड़िया, इन्द्रोका से हरिंगाराम इणखिया, नारवा से पुरखाराम भाटिया, जुड़ से राजुराम लीलड़, दूनाडा से रावतराम लोहिया, भीकमपुर से केसुपराम आइस,राजबाग-जोधपुर से सुगालाराम भाटिया, भीकमपुर से सादुलराम पिडियार, राजबाग-जोधपुर से प्रतापराम पंवार, पुंजला-जोधपुर से मगजी, मथानिया से सूजाराम इनखिया, खेतासर से किरपाराम पिडियार, बींजवाड़ीया से भोमाराम कटारिया और बालरवा से पीराराम कड़ेला आदि प्रमुख थे। इस सभा में शादी-ब्याह के लाग-बाग को लेकर जोधपुर की बारह(12) बस्ती मेघवालों की 14 पट्टी से अलग हो गयी थी।                     

               जोधपुर शहर और ओसियां का सम्मेलन--  सन् 1915 की तिंवरी की सभा में जोधपुर-शहर 9 पट्टी में शामिल था, परंतु 1920 के बालरवा के सम्मेलन में जोधपुर 14 पट्टी से अलग हो गया था। हालाँकि व्यवहार की थाली में जोधपुर शामिल रहा। जोधपुर में बेठ-बेगारी और अत्याचार का इतना आतंक भी नहीं था, जितना गांवों में था। गांवों और शहरों में उमेदाराम जी कटारिया की देखरेख और कुशल नेतृत्व में मेघवालों का 'शोषण-मुक्ति' आंदोलन पूरे जोर-शोर से चल रहा था और समाज मजबूती से एक सूत्र में एकसार हो गया। आपसी समझ, चेतना और एकता से बेठ-बेगार कम ही नहीं हुई, बल्कि उस पर पूरी पाबंदी लग गयी। गांवों में लगातार एक-दूसरे से मेल-मुलाकात, गांवों में सभा और मथारों के क्रिया-कलापों ने शोषक वर्ग को मजबूर कर दिया था। गांवों में लोग मथारे के पंचों के निर्देशों का पूरा पालन करने लग गए। मथारों के न्याय-क्षेत्र में आंतरिक या बाहरी जो भी मुद्दा या मामला आता वे तत्परता से उसका निवारण कर देते। उमेदाराम जी की देखरेख में मथारों और चौरासी की जो सामाजिक व्यवस्था पुनर्जीवित की थी वह पूरी तरह से कारगर होकर सक्रिय रूप से व्यवहार में अपनायी जा चुकी थी। निर्बाध रूप से उसका काम आगे बढ़ता रहा। शहर में भी हरिजन उद्धार और कांग्रेसी स्वयंसेवक जैसे कई संगठन भी पैदा हुए। इन संगठनों में भी मेघ  लोग भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगे और इनका सहयोग मेघ समाज को भी मिलता गया। गांवों और मथारों में समय-समय पर सम्मेलन, सभाएं या न्यात जुड़ती गयी, परंतु सन् 1920 के बाद से देश आजाद होने तक समाज सुधार सभा का कोई बड़ा सम्मेलन हुआ हो, ऐसा जानकरी में नहीं आया। परन्तु इनकी पंचायतों और खेड़ों के नियमित सम्मलेन जगह-जगह होते रहे। जिससे साधारण मेघवाल प्राण-पण रह सके। हालाँकि ये स्थान-विशेष के आन्दोलन थे, परन्तु इनका प्रभाव उस समय और उसके बाद भी सम्पूर्ण राजस्थान पर पड़ा। जोधपुर रियासत के इस क्षेत्र में सन 1915 से लेकर जब तक मारवाड़ किसान सभा ( 1940 ) का गठन नहीं हुआ था, तब तक गांवों में जागीरदारों और बेगार के विरुद्ध आन्दोलन की धुरी ग्रामीण इलाके के मेघवाल ही थे।     

                सन् 1947 को देश आजाद हुआ, मेघवाल समाज ने उसकी ख़ुशी मनाई। सन् 1950 को जब देश का संविधान लागु हुआ और रियासतों को पुराने तौर-तरीके छोड़ने को मजबूर होना पड़ा तो मेघवाल समाज ने फिर बड़ा सम्मेलन करने का विचार किया। सन् 1920 में गांवों और शहर की पंचायत अलग हो गयी थी, इसलिये दोनों जगह अलग-अलग सम्मेलन हुए। यह समाज सुधार सभा के नाम से ही हुए। .

                जोधपुर पंचायत का सम्मेलन-- जोधपुर शहर में बारह बस्ती का विशाल सम्मेलन करने के लिए सर्वश्री बस्तीराम तुंवर, पुनाराम लीलड़, हरजी बामणिया, भाणुराम, विडदाराम कड़ेला आदि पंचों ने पहल की और इसका सफल आयोजन किया। शहर में पहले 6 बस्ती थी, जो इस समय तक 12 हो गयी थी। शहर की पंचायत में इनका सभी का अलग वजूद स्वीकार किया गया। उस समय ये 12 बस्तियां निम्न थी- 1. शाहपुरा(सायपूरा), 2. राजबाग, 3. महामंदिर, 4. सहरदार, 5. मंडोर, 6. पुंजला, 7. इमरती बेरा, 8. दारू का ठेका, 9. कुचामन हवेली, 10. किली खाना, 11. सरदारपुरा और 12. बिजली घर।

                जोधपुर शहर की बारह बस्ती के प्रमुख पंचों और आगीवाण नेताओं की ओर से दिनांक 9 सितंबर, 1951 (संवत् 2008 के भादवा की शुक्ल पक्ष की बीज ) को भगवानदास जी जोया की अध्यक्षता में आम सभा का आयोजन महामंदिर के ‘लखजी के धड़े’  पर हुआ। इस समय तक जोधपुर रियासत भारत गणराज्य में मिल चुकी थी।  इस सभा में देश की आजादी और गणतंत्र की खुली हवा का स्वागत किया गया। इस सभा में समाज हित में कई निर्णय लिए गए और मेघवाल समाज का जीवन स्तर सुधारने के लिए खान-पान, रहन-सहन में सुधार और बच्चों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया। शहर की इस सभा में 12 बस्ती के निम्न प्रमुख़ पंच मौजिज थे- 1. शाहपुरा से भाणु जी गोदा, छोगाराम बामणिया, सूरजमल कड़ेला, गंगाराम कड़ेला, दयाराम पंवार आदि, 2. राजबाग से प्रतापजी पंवार, सुरजमल दइया, रुगाराम, लाधुराम लीलड़, बस्तीराम इणखिया आदि, 3. महामंदिर से मगाराम पिडियार, दयाराम पिडियार आदि, 4. सहरदार से बिडदाराम कड़ेला, चेलाराम राठौड़ीया, भंवरलाल भाटिया, उदाराम पिडियार आदि, 5.मन्डोर से नथुराम गोदा, पाखुराम पंवार, जेठुजी गोदा आदि, 6.पुंजला से भीयाराम पालड़िया, रुगनाथ पंवार, धर्माराम पालड़िया आदि, 7. इमरती बेरा से रूपाराम पंवार, शिवनाथ सोलंकी, 8. दारू का ठेका से खिंवराज गोधा, सूरजमल बोसिया आदि, 9. कुचामन हवेली से उमाराम जी, ढीमजी सेजू आदि, 10. किलिखाना से टाउराम कड़ेला, हरेश पंवार आदि, 11. सरदारपूरा से नारायणजी तुंवर, मांगीलाल लालणेसा आदि, और 12. बिजली घर से रामूजी कड़ेला, जेठुजी पिडियार, गणेशराम देपन, हजारीराम बामणिया आदि।

               इस अवसर पर शहर की कार्यकारिणी का भी गठन किया गया, जिसमें सर्वसम्मति से भगवानदास जोया को सभापति, बस्तीराम तुंवर को उपसभापति, हजारीराम बामणिया को कोषाध्यक्ष, भाणुराम गोधा को मंत्री, बिउदाराम गदेला को प्रचार मंत्री और पुनाराम लीलड़ को पोतदार चुना गया।

                गांवों की पंचायतों का ओसियां-सम्मेलन- देश के आजाद होने के बाद गांवों में भी ख़ुशी मनायी गयी और 1952 में गांवों की पट्टियों का एक बड़ा सम्मेलन किया गया। यह सम्मेलन संवत् 2009 की चैत वद एकम तदनुसार दिनांक 13 अप्रेल 1952 को ओसियां के देव के बेरे पर उमेदाराम जी कटारिया की अध्यक्षता में आयोजित हुआ। यह एक आम चौरासी (84) न्यात थी। इस चौरासी की न्यात यानि विशाल सभा में समाज में जो कुरीतियां है, उस पर विचार विमर्श किया गया और उन्हें शीघ्र त्यागने का सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया। बेठ-बेगार के बारे में भी विमर्श हुआ, जिसे बहुत पहले बन्द कर दिया था, परंतु कहीं-कहीं पर इसके होने की जानकारी भी मिली। इस पर विचार कर सर्वसम्मति से सख्त निर्णय लिया कि किसी भी सूरत में बेठ-बेगार कतई नहीं की जाय। समाज के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिये बच्चों की शिक्षा पर ध्यान दिया जाये। विवाह आदि सामाजिक रीति-रिवाजों में लाग-बाग आदि भी सर्वसम्मति से तय किये गये।

                इस चौरासी में मुख्य-मुख्य पंच निम्न लिखित थे- सदर तिंवरी से उमेदाराम जी कटारिया, लोहावट से अमेदाराम जयपाल, घेवड़ा से भीयाराम इणखिया, पांचला से मंगलाराम लिखणिया, खेतासर से गोरखराम और नारूराम पिडियार, थोब से भीयाराम धनदे, होंणीया से जोधाराम कटारिया, बड़ला से मेहरामराम पिडियार, कोरडा से भेराराम गुलू, ओसियां से मोडाराम बोसिया, गुलाराम गंढेर और लाधुराम सोलंकी आदि प्रमुख थे। सन् 1920 के बाद होने वाले सम्मेलनों में ये बड़े सम्मेलन थे और इनका विस्तृत और दूरगामी प्रभाव मेघ समाज पर पड़ा।

                 उमेदाराम जी कटारिया के शोषण-मुक्ति के प्रयासों की प्रमुख-प्रमुख घटनाओं और उनकी तारीखों का उल्लेख किया गया था। उनके सफल मार्ग निर्देशन और उनके व उनकी जुझारू टीम के त्याग और बलिदान से ही इस क्षेत्र में शोषित जातियां एकजुट हो सकी और शोषण, बेठ-बेगारी और जजमानी के चंगुल से बाहर निकल सकी। मेघवाल जाति के स्वाभिमान और सम्मान के लिए ऐसे महापुरुषों द्वारा किये गए कार्यों को आने वाली पीढ़ी के सामने लाना हमारा सभी का कर्तव्य है। ऐसे लोगों के के चरित्र और संघर्ष की गाथाओं से हममारी आने वाली पीढ़ी को सहस मिलता है और इतिहास का निर्माण भी होता है। इसी बात को ध्यान में रखकर मैंने उनके संघर्ष के कुछ पहलुओं को आपके सामने रखा है।

                इसी क्रम में केतु मथारे ने ‘समाज-सुधार सभा’ की सभा अपने क्षेत्र में करने का निवेदन किया, जिसे 14 पट्टी ने स्वीकार कर लिया और अगली न्यात(महासभा) शेरगढ़ में करने का तय हुआ।  दिनांक 3 मार्च 1915 की तिंवरी की सभा के बाद 6 फरवरी 1920 की बालरवा, 9 सितंबर 1951 की जोधपुर और 13 अप्रेल 1952 की ओसियां की बड़ी महासभाओं के क्रम में शेरगढ़ में होने वाली यह सबसे बड़ी पंचायत थी। इसमें 1915 से लेकर अब तक के सब मुद्दों पर पुनः आत्म-मंथन किया गया और बेठ- बेगारी और हीन समझे जाने वाले धंधों को समाज के किसी भी व्यक्ति द्वारा नहीं किये जाने का संकल्प दोहराया गया और समामेलन और लाग-बाग को पुनः दोहराया गया। बीते वर्षों में जो अनसुलझे मामले थे उनका भी निपटारा किया गया।

                15 दिसंबर 1958 का ऐतिहासिक दिन : शेरगढ में हुई पंचायत- समाज सुधार सभा के विधिवत गठन (1920 को मानते हुए, न कि 1915 )के बाद एक तरह से देखा जाय तो यह तीसरी बड़ी पंचायत थी। इसका विधिवत प्रारंभ संवत् 2015 के फागण वद अमावस को दिनांक 15 दिसम्बर 1958 को शेरगढ़ में हुआ। इस महा-पंचायत की अध्यक्षता चेराई के लाभूराम जी लीलड़ ने की। इसकी खास बात यह थी कि अब समाज सुधार का काम समाज में व्याप्त कुरीतियों को मिटाने की ओर ज्यादा केंद्रित किया जाने लगा और खान-पान व रहन-सहन के तौर-तरीकों, रीति-रिवाजों और लाग-बाग को पुनर्विवेचित कर उसे समय और परिस्थिति के अनुरूप किया गया। इन सब पर अलग पोस्ट में लिखा गया है, इसलिए यहाँ नहीं दोहराह रहे है।

                इस में भाग लेने वाले मुख्य पंच सर्वश्री प्रतापाराम लिखणिया (बेलवा), चेतराम लिखणिया (पांचला), पीपाराम धांधू (सेतरावा), जोराराम लवा (खियासरिया), भलाराम (केतु कला), चुनाराम पंवार ( देचू ), पुनाराम (कनोडिया), भूराराम (आलाई ), गुनाराम (लोहारंद), दमाराम लीलड़ ( हापां ), आदि कई मौजिज पञ्च थे।

                 हमारे अग्रणीय मेघ पुरुष उमेदाराम जी कटारिया के देहावसान के बाद सन् 1979 में पुनः तिंवरी में सभा हुई! यह संवत् 2036 के आसोज की शुक्ल पक्ष की आठम के दिन तारीख 17 सितंबर 1979 के दिन प्रारंभ हुई। इसकी अध्यक्षता पुनाराम जी कटारिया ने की और कुछ सत्रों की भूंगरा निवासी शिवलाल जी ने की।
इसमें उस समय के 160 गांवों के मौजिज पंचों ने भाग लिया। यह सभा भी 15 दिन तक चली और सब विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।

                इसमें जो पञ्च कर्ता-धर्ता थे, उन में से निम्न प्रमुख थे.- सर्व श्री प्रतापाराम लिखणिया (बेलवा ), दमाराम (बालेसर ), लोंगराम (शेरगढ़ ), माँहिंगाराम व खीयाराम (मथानिया ), हिमताराम (लोहावट ), सांगाराम (सेतरावा ), बुधराम (आगोलाई ), दुर्गाराम ( चेराई ), गोरखाराम व नाराराम ( खेतासर ), रतनाराम ( नाथडाउ ), भगोनाराम (जेलू ), जसराम ( केरु ), कुनजी (इंद्रोका ) आदि थे।

            
              मैंने आपके सामने उमेदाराम जी कटारिया के संघर्ष की सन 1915 के बाद की कुछ घटनाओं और तिथियों का जिक्र किया गया।  अलग-अलग बिखरी पड़ी और अलग अलग धड़ों और कुनबों में बंटी कौम को उमेदाराम जी एक करने और संगठित करने में कैसे कामयाब हुए? उनका यह ऐतिहासिक प्रयास विचम्भित करने वाला है। कई बातें थी, जिसका मैंने मेघवंश इतिहास और संस्कृति में विश्लेषण किया है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण जो बात थी वह थी- सबसे पहले इस कौम के आंकड़ों यानि data का संग्रह करना। उनका यह काम ऐतिहासिक और आधारभूत था, जिसके कारण ही वे इस समाज को संगठित कर पाये और मुक्ति संघर्ष को सफल बना पाये।

                सामाजिक सुधार और मुक्ति आंदोलन शुरू करने से पहले उन्होंने हर गांव और वाड़/बाड़ीयों में निवास करने वाले मेघों के घरों की स्थिति और संख्या को इकट्ठा किया, फिर पंचों के माध्यम से हर वाड़ी या गांव-ढाणी में मेघों की जन-संख्या को अपने स्तर पर इकट्ठा किया। यह संख्या प्राप्त करने के बाद फिर उन्होंने उन्हें वाड़/बाड़ियां और गांवों की सीमा रेखा में बांटा, जिसे खेड़ा कहा गया। किस बाड़ी या गांव में यानि कि खेड़े में कितने मेघों का समूह होगा , यह तय किया। कई गांव अकेले ही अपने आप में खेड़े के रूप में बनाये गए तो कई खेड़े ऐसे भी थे जिनमें एक से ज्यादा गांव या वाडियां थी। किस खेड़े में कितने मोहल्ले होंगे, धड़े होंगे या गांव होंगे यानि की भाग होंगे यह सब मेघों की बस्तियों और मेघों की वास्तविक संख्या प्राप्त करके उसके आधार पर बड़ी सिद्दत और दूरदृष्टि से तय किया गया था। किस-किस को पंचायत में कितना कितना प्रतिनिधित्व मिलेगा, यह सब आपसी मन्त्रणा से तय किया। यह सब मेघों के प्राचीन गणतंत्र की की रूपरेखा के आधार पर ही निर्धारित किया गया था। यह ध्यान देने की बात है कि कम से कम 8 खेड़ों से कम की एक पट्टी नहीं हो सकती थी और 24 खेड़ों से ज्यादा होते ही दूसरी पट्टी बनानी जरुरी थी। सब तरह से कुल 12 खेड़ों की पट्टी एक आदर्श पट्टी मानी गयी।

              हर एक पट्टी का एक मुखिया या प्रमुख़ बनाया गया, जिसे उन्होंने मथारा कहा। मथारा अपने आप में एक स्वतंत्र इकाई थी। मथारा उस गांव को बनाया गया, जिस गांव के मेघवालों में आकीन-आबरू और जुझारूपन था। उनके अंदर नैतिक और सामाजिक बल की पराकाष्टा थी, उनके बराबर का उन खेड़ों में दूसरा कोई नहीं होता था। वहां के लोग अनुभवी, आण-बाण के पक्के, न्यायप्रिय और बुद्धिमान होते थे। कौम के हर-एक काम को संकल्प के साथ परिणाम तक पहुचाने वाले थे। जहाँ कहीं भी कोई भीड़ या पीड़ पड़ जाती या विपत्ति आ जाती वे कौम के लिए दिन हो या रात वहाँ जाते थे और संबल और साधन से उस काम को निस्वार्थ भाव से पूरा करते थे। मथारे सामाजिक और नैतिक रूप से निष्कलंक होते थे। नैतिक और सामाजिक पक्ष पर किसी को भी उनके विरुद्ध अंगुली उठाने तक का मौका नहीं देते थे। उनके अधीन आने वाले खेड़ों के हर प्रकार के मुद्दे को हर तरह से व न्याय से तत्काल निपटान कर देने वाले थे। इन सब पर 14 पट्टी का नियंत्रण और ऐसी 14 पट्टियों के कम से कम 6 भुवनों से बनने वाली 84 का उन पर नियंत्रण होता था।

                कोई भी मथारा जाने या अनजाने में अगर कौम को लजाने वाला काम कर दे, समाज विरोधी काम करदे या उनके अधीन आने वाले खेड़ों में ऐसा हो जाय और मथारा समय रहते उसका निवारण नहीं कर पाये तो मथारे की पदवी छीन ली जाने का प्रबंध किया गया था और दूसरे वाड़ या खेड़े को मथारा बनाया जा सकता था। कहने का तात्पर्य यह है कि उन्होंने जो व्यवस्था बनायीं वह व्यवहारिक थी। उसकी सक्रियता हर स्तर पर थी। इसलिए वे इस आंदोलन को सफल बना पाये!

                ये जो दो स्थितियां बताई गयी है, इनसे यह स्पष्ट होता है कि अनपढ़, अज्ञानी और जुल्म से त्रस्त होने के बावजूद भी हमारे लोगों ने इज्जत के जीवन को वरीयता दी। हमारे समाज के साधु-संतों, समाज-सुधारकों और पञ्च-पटेलों ने विगत काल में इस समाज को नई दिशा देने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी थी, जिनकी बदौलत जातिगत पेशे की जो मार थी और जमींदारों और साहूकारों का जो जुल्म और अत्याचार था, उस से इस जाति ने मुक्ति पायी। हम सभी उनके प्रति कृतज्ञ है। जबरदस्त विरोध और भय के बीच भी उन्होंने साहस के साथ स्वाभिमान का जीवन जीने का संकल्प लिया और हमें अबाध प्रेरणा और उर्जा दी। जजमानी परंपरा की बैठ-बेगारी, त्यौहारी और फड़के के फज़ल को उन्होंने लाख विपत्तियों का सामना करते हुए तिलांजलि दे दी। देश आजाद होने के बाद इस तरह की कोई जोर-जबरदस्ती या अत्याचार नहीं हुआ, परन्तु नागरिक अधिकारों के समान बर्ताव का व्यवहार फिर भी हमारे समाज के साथ नहीं हुआ और न अभी हो रहा है। यह एक बहुत बड़ी त्रासदी और दुःखदपूर्ण स्थिति है, जिसका सामना आपको और हम सबको दृढ़ता और साहस से करना है। और, तब तक करते रहना है, जब तक बराबरी, भाईचारा और स्वतंत्रता के आधार पर समाज खड़ा नहीं हो जाता है।

                पहले हमारे समाज में पढाई-लिखाई नहीं थी, सरकार की मशीनरी में हमारा कोई सीर या सरोकार नहीं था, जो किसी भी जाति या समाज की प्रतिष्ठा को बढाने वाला होता है। बहुत कम रोजगार थे और वो भी विशेष-विशेष जातियों से जुड़े हुए होते थे। आज वैसी स्थितियां नहीं है। पढाई-लिखाई नहीं होने से और अज्ञानता या ज्ञान की कमी के कारण हमारे लोगों को जो कुछ थोड़े-बहुत पढ़े लिखे या होशियार लोग या साधु-संत लोग बता देते थे, हमारे लोग उसे लौहे की लकीर मानकर अमल कर देते थे। आज हर गांव में कोई न कोई ग्रेजुएट मिल ही जाता है। हमारे समाज में शिक्षा का प्रसार हुआ है, हालाँकि वह नाकाफी है, परन्तु पहले से काफी अच्छा है। हमारे लोग सरकारी नौकरियों में भी आने लगे है और शहरों में हम लोगों की नफरी भी बढ़ने लगी है। ये सब और ऐसे अनेक संकेत हमें आशावान बनाते है। हमारे लोग अभी भी गरीबी और अज्ञानता में जी रहे है। मेघवाल जाति कृषि आधारित जीवन-यापन करने वाली ग्रामीण जाति है। इसकी जनसँख्या के 91% लोग गांवों में रहते है, जहाँ प्रगति का कोई लाभ इन्हें नहीं मिला है। हमारे पास स्थायी रोजगार के कोई साधन नहीं है। जीविका के साधन और शिक्षा या ज्ञान ही किसी जाति को सम्मान और स्वाभिमान दिलाती है। इसलिए इस समाज को आगे बढ़ाना है और इसके सम्मान और स्वाभिमान को बढ़ाना है तो समाज में ज्यादा से ज्यादा शिक्षा का प्रसार करना पड़ेगा और ज्यादा से ज्यादा अच्छे से अच्छे ओहदों को हासिल करना पड़ेगा। इसके लिए युवाओं को मेहनती और महत्त्वाकांक्षी बन कर उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त कर प्रतिस्पर्धाओं की बाधाओं को पार करना पड़ेगा। सारी दुनिया में पढ़े-लिखे समाज को इज्जत से देखा जाता है, चाहे कोई भी युग रहा हो शिक्षित समाज हमेशा सम्मान का पात्र रहा है, इसलिए विगत को भूलकर अब इस समाज को शिक्षा पर ज्यादा से ज्यादा ध्यान देना चाहिए। समाज की ओर से समाज के कर्णधारों के नाम से स्कूल और कोलेज खोलने की शुरुआत करनी चाहिए। जितना रुपया-पैसा मरने-परने पर खर्च करते है, उसको कम करके विद्यालयों और छात्रावासों के निर्माण और उनके रख-रखाव में लगाये तो हम लोग बहुत जल्दी प्रगति कर सकते है और अपने स्वाभिमान और सम्मान को बढ़ा सकते है। ब्राह्मणवादी धर्म में अपनी जाति को ऊपर उठाने के नाम पर कई बुराईयाँ हमारे समाज में घर कर गयी है, उन्हें छोड़ देने में ही भलाई है और जो परंपरा या धर्म हमारे सम्मान को और स्वाभिमान को ठेस पहुचाएं, ऐसे धर्म को ढोने से भी कोई फायदा नहीं है। अपने सम्मान और स्वाभिमान के लिए हमें इस पर सामाजिक रूप से विचार करना चाहिए और कोई न कोई रास्ता निकालना चाहिए। 

                जो अन्याय और अत्याचार हम पर हो रहे थे, उनका प्रतिरोध इन आन्दोलनों ने खड़ा किया, इस बात को हम नकार नहीं सकते हैं। यह एक कदम आगे बढ़ना था। जैसा कि आप जानते हैं, कई मामलों में राजसत्ता का उपयोग किये बगैर सामाजिक अन्याय को समाप्त करना मुश्किल है। इस पर आजादी के दौर में बहुत लम्बी-चौड़ी बहसें हुईं, आन्दोलन हुए, वाद और प्रतिवाद हुए और हमारे समाज के कई लोग राजनीति में आये और धार्मिक क्षेत्र में आये, उन सब का उद्देश्य सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में हमारे समाज की गरिमा को ऊपर उठाना था। सामाजिक क्षेत्र में अछूतपन से मुक्ति औए शोषण के खिलाफत आन्दोलन की धुरी हमारा समाज ही बना रहा। उनकी ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता है। वे लोग प्रतिबद्ध थे। इस समाज के कई लोगों ने साधु-सन्यस्त होकर, कईंयों ने समाज-सुधारक बनकर और कईंयों ने नेता बनकर इस समाज का मार्गदर्शन किया। ऐसे प्रत्येक शख्स में समाज को एक नयी दिशा देने का जोश था, प्रेरणा थी और परिस्थिति थी। वे साधन संपन्न थे या साधन विपन्न, वे अपने ध्येय के प्रति अटूट आस्थावान थे। शहरों में संस्थाएं आन्दोलन कर रही थीं तो गांवों में हमारी पंचायतें पूरे संकल्प और शक्ति के साथ थोपी गई निर्योग्याताओं के विरोध में हर स्तर पर आंदोलनरत थीं। मेघवाल समाज का सर्वाधिक संघर्ष और आन्दोलन गांवों में रहा, क्योंकि उनकी कुल जनसँख्या का 92% भाग यानि 100 में से 92 लोग गांवों में ही रहते हैं। इस समाज के सन 1879 में हुए निर्णय की पृष्ठभूमि और बाबा साहेब के 'गंदे धंधे और बेगारी छोड़ने के आह्वान' ने इस समाज को पुनः जागृत कर दिया और फिर एक बार सवर्ण समाज के सामने चुनौती पैदा कर दी, हर स्तर पर- धर्म के स्तर पर, राजनीती के स्तर पर और सामाजिक स्तर पर। मेघवालों का 'खुली-बंधी का आन्दोलन', जो हकीकत में हिन्दू समाज के सवर्ण वर्चस्व के विरुद्ध खिलाफत था, उसका पूरा मूल्यांकन अभी तक हुआ नहीं है। उनके 'बेगारी-उन्मूलन' आन्दोलन का भी कोई मूल्यांकन हुआ नहीं है। पर यह ऐसा दौर था, जिसमें राजनीति एक महत्त्वपूर्ण घटक बन गयी थी और मेघवाल लोग उसकी प्रमुख धुरी, हालाँकि जनसँख्या के लिहाज से वे अभी भी सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए अदद बने हुए हैं, पर वैसी परिस्थितियाँ नहीं हैं। इसलिए राजनीतिक रूप से उस समय जो मेघवालों का वजूद था, वैसा अब नहीं है।

                अन्याय और अत्याचारों के विरुद्ध उनका सामाजिक प्रतिकार आन्दोलन नाकामयाब रहा हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता है। उनका धार्मिक आन्दोलन और राजनीतिक चलवल अपनी जगह ठीक थे। जब पूना पैक्ट के बाद दोहरे मतदान की बात आई और गंदे धंधे छोड़ने की बात आई, आन्दोलन हुआ तो पहली बार मेघ समाज में इन बातों को लेकर कुछ लम्बी खींच-तान हुई। जो लोग मेघवालों के मुक्ति आन्दोलन की थोड़ी बहुत भी जानकारी रखता है, वह जानता है कि सारे भारत में उस समय दलित समाज के लिए आशा की एक मात्र किरण डॉ. आंबेडकर थे और मेघवालों की पंचायतें उनके नक़्शे कदम पर चल रही थीं। अनुसूचित जातियों के कई संगठन थे, उनमें से कई संगठनों ने कांग्रेस की लाइन पर डॉ. आम्बेडकर का विरोध भी किया। ऐसे इने-गिने लोगों को छोड़कर पूरा समाज डॉ. आंबेडकर के साथ खड़ा था। शुरूआती दौर में आदि धर्म आन्दोलन से जुड़े लोग और आर्य समाज से जुड़े लोग भी डॉ. अम्बेडकर के विरोध में खड़े दिखे, पर बाद में परिस्थियाँ बदल गयीं। ऐसा क्यों हुआ, उसका सबसे प्रमुख कारण मेघवालों की पंचायतें थीं और दूसरा बॉम्बे में खोती-प्रथा या वतनदारी का कानून पारित होना था। जो मेघवालों के बेगारी के विरुद्ध किये जा रहे संघर्ष में मददगार था। इस दौर में गंदे धंधे छोड़ने, मरे हुए जानवरों की खाल नहीं उतारने और मरे हुए पशुओं का मांस नहीं खाने की जो शर्तें 1879 में तय हुई थीं, उनकी सख्ती से पालना करने के फरमान मेघवालों की पंचायतों ने जारी करने शुरू कर दिए। हमारे क्षेत्र में ये काम आजादी से पहले ही बंद कर दिए गए थे पर कुछ जगह अपवाद भी थे। उन पर पंचायतें सख्त होने लगीं। इसी सख्ती के विरुद्ध सवर्ण हिन्दू समाज खड़ा हो गया और कुछ हमारे ही लोग, कारण यह था कि पंचायतों के फरमान, जिसे परवाना कहा जाता था, उस पर जब तक राज की निशानी/सील नहीं लगती थी तब तक वह बाध्यकारी नहीं होता था और कोई भी हाकिम या जागीरदार ऐसा करने को तैयार नहीं रहता था। इसलिए मेघों पर भयंकर विपत्ति थी, फिर भी सभी मुसीबतों को झेलते हुए भी उन्होंने गंदे कहे जाने वाले कामों को स्वतः तिलांजलि दे दी। उनके साथ अन्य कौमों ने ऐसा नहीं किया। यह भी एक कटु सत्य है।

                कुल मिलाकर बात यह है कि जिस प्रकार की समाज़िक, धार्मिक और राजनीतिक स्थिति हमें चाहिए, वैसी स्थिति प्राप्त करने के लिए हमें देर नहीं करनी चाहिए। हम लोगों की जनसँख्या अपने आप में इतनी विशाल है कि हम लोग राजनीति में या किसी धर्म में एक साथ रहते हैं तो एक सबल और उन्नत समाज का निर्माण कर लेंगे। हमारे बिना हिंदू हो या मुस्लिम, उनकी राजनीति परवान नहीं चढ़ सकती है। हिन्दू धर्म का अस्तित्व भी हमारे लोगों की वजह से है। अगर किसी धर्म को मानने वाले ही नहीं हों तो उस धर्म की क्या गति होगी? आप अंदाजा लगा सकते हैं। रोज-रोज की धर्म की पाबंदियों और भेद-भाव से तो अच्छा नहीं है कि हम ऐसे धर्म से किनारा कर लें? ऐसे धर्म में हमारा रहना और न रहना बराबर नहीं है? धर्म आदमी की उन्नति के लिए होता है। उसकी अवनति या पतन के लिए नहीं। इस पर भी हमें विचार करना चाहिए।

                आजादी के दरम्यान हमारे जो साधु-संत हुए, उन्होंने अपने अनुभव और ज्ञान से हमारा मार्ग दर्शन किया। जैसा उन्होंने हमें बताया हम उस पर आकीं हुए। भारत के विभाजन से पूर्व हमारे समाज का निकट सम्बन्ध सिंध के हैदराबाद, लाहौर, स्यालकोट, पेशावर, भावलपुर आदि जगहों से रहा और इधर से उधर आते-जाते रहे। वहां पर आजादी के दौर में जो गतिविधियाँ होती थीं, उसमें मेघ लोग सक्रिय भागीदार थे। मैंने सन 1857 के आन्दोलन में मेघों के योगदान पर एक जगह चर्चा की है। उनकी धार्मिक जाग्रति के बारे में आर्य-समाज के सन्दर्भ में प्रकाश डाला है। हमारे मुक्ति-संघर्ष में बेगारी के साथ खेती की जमीनों पर जो बिचौलियों और सूद खोरों का भयावह साया था, उस के विरुद्ध भी सिंध और यहाँ पर एक साथ आवाज उठी। बाबा साहेब डॉ आंबेडकर के प्रभाव से इस में क्रन्तिकारी बदलाव आये और जब सर छोटूराम ने 'यूनियनिस्ट पार्टी' तले आन्दोलन चलाया तो हमारे समाज ने उनका भी साथ दिया। हमारे समाज के स्वतंत्रता सेनानी नरपत सिंह और एडवोकेट भगत हंसराज मेघ को कौन भूल सकता है। वे इस आन्दोलन के अग्रणीय मेघ पुरुष थे। अखंड भारत की पंजाब सूबे की सरकार में वे आजादी से पहले सर छोटूराम की सरकार की काबिल मंत्री परिषद के काबिल सहयोगी रहे। जब बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने शेड्यूल्ड कास्ट फेडरशन का गठन किया तो यूनियनिस्ट मिशन और फ़ेडरेशन के बीच एक साझा आन्दोलन चलाने की रणनीति भी तैयार हुई। इस आन्दोलन में कणवारिया उम्मेदाराम कटारिया, पीपाराम, मदाराम और ऐसे कई पुरुष है, जिन्होंने बेगारी के विरुद्ध पंचायतों के माध्यम से प्रतिकार को आंदोलन का रूप दिया। उन सबके प्रति हम कृतज्ञ है।

                आजादी के दरम्यान और उसके बाद कई मेघवाल घर-बार छोड़कर संन्यस्त हो समाज सुधारक की भूमिका में भी आगे आये। उन लोगों का ध्येय इस समाज को हिन्दू धर्म और समाज में एक गौरवशाली स्थान दिलाना था। संत पुरुष उमाराम, उत्तमाराम, अछलाराम, टीकुराम, साधू राम प्रताप और संत पुरुष गोकुलदास जैसे अनगिनत लोग थे। जो धर्म के द्वारा मेघवालों की मुक्ति की वकालात करते थे। इन में से कई लोग 'बेगारी-उन्मूलन' और 'खुली-बंदी' के आन्दोलन से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए थे। इन का प्रभाव अपने-अपने क्षेत्रों में था। गोकुल दास जी का कार्य क्षेत्र अजमेर और अजमेर से इतर भीलवाडा और मध्य प्रदेश की सीमाओं में था। मारवाड़ में टीकुराम जी, अछलाराम जी और अन्य लोगों का था। इन सब के धार्मिक विचार एक आन्दोलन की शक्ल में देखें तो मोटे रूप में तीन भागों में बाँट सकते हैं- वैदिक कर्म-कांडी, आर्य-समाजी और महाधर्मी। जिन का आग्रह वेद धर्म पर था, वे हिन्दू धर्म की आलोचना करते हुए भी अद्वैत धारणाओं पर अवलम्बित थे। जिनका आग्रह आर्य-समाज की स्थापनाओं से जुडा था, वे दयानंद के शुद्धि के पक्षधर थे और महाधर्मी की पतवार और प्रमाण बाबा रामदेव, भरथरी, कबीर और ऐसे ही संत पुरुषों की वाणियाँ, वचन और साखी थे। उन सब में एक समान बात यह थी कि ये सभी स्वतंत्रता के समय से मेघवालों का एक 'नया-समाज' निर्मित करना चाहते थे, जो सवर्ण हिन्दुओं के मुकाबले में किसी से कम नहीं हो। निश्चित रूप से इन लोगों में इस समाज को सामाजिक स्तर पर ऊपर उठाने की और प्रतिष्ठित करने की ललक थी, परन्तु हिन्दू पुनर्जागरण के थपेड़ों में संस्कृतिकरण की भेंट चढ़ गए। इनका प्रचार और प्रभाव व्यक्तिगत चेलों की मंडली पर टिका था, जो अधिकांशतः गृहस्थ थे। मेघवालों की पंचायतों की पहुँच से ज्यादा इनका कोइ अलग संगठन नहीं बन सका। इस कमी को देखते हुए पिछले कुछ दशकों में हिन्दू धर्म के वैदिक प्रचार ने उसे ब्राह्मणवादी चोगा पहना कर नया रूप देना प्रारंभ किया है। इस अवसर पर इस से अधिक इस पर कहना प्रासंगिक नहीं है, पर मेघों की चेतना में इन साधु-संतों ने जो मार्ग दर्शन और योगदान दिया, उसे भुलाया नहीं जा सकता है। इन प्रतिकार या ख़िलाफत आंदोलनों को उस समय के पत्र-पत्रिकाओं में उचित स्थान नहीं मिला और हमारे आंदोलन को आज़ादी के आंदोलन में दबा दिया गया

                हमारा समाज सबल नहीं है, यह जानते हुए हमारे लोगों को हर एक रोजगार में प्रविष्ट होना चाहिये। रोजगार से सामाजिक सुरक्षा मिलती है। खेती के कामों में नई तकनीक और प्रौद्योगिकी को अपनाना चाहिए। सरकार की किसी भी तरह की नौकरी हो, उस में अधिक से अधिक आना चाहिए। अगर हमारे समाज के लोग ज्यादा से ज्यादा नौकरियों में आते है तो यह समाज के सम्मान और गौरव की बढ़ोतरी होगी।

                अन्त: में, मैं आप सबका और आयोजकों का आभार व्यक्त करते हुए अपना स्थान ग्रहण करता हूँ। आशा करता हूँ कि हम सब कृत-संकल्प होकर समाज व देश-हित की उन्नति हेतु निरंतर प्रयास करते रहेंगे और एक स्वाभिमानी और गौरवशाली समाज निर्माण में कामयाब होंगे।



                जय भीम !                           जय भारत !!